बेमौसम हुई बारिश से फसल बर्बादी ने किसानों के मस्तिष्क पर बढ़ा आघात किया है। जिले में अब तक 32 किसान दम तोड़ चुके हैं। इनमें से कई ने आत्मदाह कर लिया। इस दर्द को दिमाग से दूर करने के लिए मानसिक स्वास्थ्य संस्थान एवं चिकित्सालय ने तैयारी कर ली है। गांवों में कैंप लगाकर काउंसलिंग के जरिए न सिर्फ अवसाद से उबारा जाएगा बल्कि उनमें सकारात्मक ऊर्जा का संचार करने का भी प्रयास होगा। संस्थान में भी संस्थान में डिफट्रैस एंड सुसाइड प्रिवेंटिव क्लीनिक खोला है।
क्लीनिक में मनोचिकित्सक डा. दिनेश राठौर के नेतृत्व में डा. विक्रांत अग्रवाल, डा. ललित कुमार और मनोविज्ञानी डा. धर्मेंद्र कुमार काउंसलिंग करेंगे। निदेशक डा. सुधीर चौहान ने बताया कि तानव और अवसाद कई मौकों पर आत्महत्या की वजह भी बनते हैं।
लगातार होगी मॉनीटरिंग
ओपीडी में सबसे पहले मनोचिकित्सक मरीज से पारिवारिक स्थिति जानेंगे। फसल नुकसान को लेकर उसकी दूरगामी सोच का अध्ययन होगा। जीवन व्यर्थ बताने या फिर मरने की बात कहने वाले मरीजों से सकारात्मक बातें कर उसकी सोच बदलने का प्रयास होगा। काउंसलिंग बाद मनोचिकित्सक दवाएं देंगे। मॉनीटरिंग के लिए उसके नजदीकी परिजन से लगातार संपर्क किया जाएगा।
आत्महत्या की बड़ी वजह नकारात्मक सोच
आत्महत्या या फिर हार्टअटैक के लिए बड़ी वजह नकारात्मक सोच है। ऐसे लोग जल्द निर्णय ले लेते हैं। मनोचिकित्सक डा. दिनेश राठौर ने बताया कि तनाव या फिर अवसाद के दौरान मस्तिष्क के न्यूरोट्रांसमीटर में बदलाव होता है। मानसिक संतुलन बिगड़ने लगता है। जीवन को व्यर्थ मानते हुए व्यक्ति आत्महत्या कर लेता है।