जून के महीने में तापमान चढ़ रहा है, जिसके चलते गर्मी से भगवान को बचाने के लिए जतन हो रहे हैं। मंदिरों में ठंडे पदार्थों का भोग लगाया जा रहा है। तो वहीं ठाकुर बांके बिहारी को गर्मी से निजात दिलाने के लिए फूल बंगला में विराजमान कराया जा रहा है।
मथुरा वृंदावन में आराध्य को ग्रीष्म ताप से शीतलता प्रदान करने के उद्देश्य से फूल बंगला का निर्माण प्रारंभ हो गया है। 16वीं शताब्दी में रचित वाणी साहित्य में फूलबंगले में ठाकुरजी के विराजने का वर्णन प्राप्त होता है। फूलबंगले में उपयोग में लाए जाने वाले फूलों एवं बंगला निर्माण के विविध पक्षों से संबंधित जानकारी पदावलियों में प्राप्त होती हैं। ठाकुरजी को शीतलता प्रदान करने के लिए फूलबंगला, गले में वैजयंती माला व कानों में कनेर पुष्प के कुंडल सजेंगे। यह जतन सावन माह के कृष्णपक्ष की हरियाली अमावस्या तक (चार माह) वृंदावन के मंदिरों में होने वाले विशेष आयोजन में किए जाएंगे।
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श्रीबांकेबिहारी मंदिर के सेवायत प्रह्लाद गोस्वामी ने बताया कि फूलबंगले को सजाने का कार्य परस्पर सामंजस्य से अलग-अलग होता है। कारीगर ठाकुरजी के विराजने वाले स्थल फ्रेम ठाट को सजाते हैं तो कुछ लोग सिंहासन से नीचे लगने वाले बिछैया को बनाते हैं। इस प्रकार फूलबंगला में प्रयुक्त होने वाले अन्य फ्रेम जिन्हें बगली, पिछवाई, छप्पर, शिखर दरवाजा, तिदरी, झाड़ आदि कहा जाता है।
फूलबंगले के निर्माण में रायबेल की कलियों का ही प्रयोग किया जाता है। इसके बाद जाल की डिजाइन छठमासा, अठमासा, वृंदावनी आदि होती है। ठाकुरजी के पीछे लगने वाले ठाठ जिसको पिछवाई कहा जाता है, इसको फूलबंगले के उस्ताद स्वयं तैयार करते हैं।
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ब्रज संस्कृति शोध संस्थान के प्रकाशन अधिकारी गोपाल शरण शर्मा बताते हैं कि फूलबंगला का निर्माण जहां पहले साधकों की भाव साधना पर आधारित था, वहीं आज यह कला रोजगारोन्मुखी हो गई है, स्थानीय कलाकारों के साथ बाहर के अन्य कारीगर भी वृंदावन आकर फूल बंगले के निर्माण का कार्य करते हैं।