हुकूमतें बदलीं, बरौली अहीर के पट्टी पचगाईं की तस्वीर नहीं। उदासीनता और उपेक्षा के चलते यहां के अधिकांश लोगों की जिंदगी भागकर नहीं, बल्कि घिसट कर गुजर रही है। कोई 20 साल से तो कोई दो साल से अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो सका है। बरौली अहीर ब्लॉक के पट्टी पचगाईं गांव में तीन पीढ़ियों के अधिकांश लोगों की ऐसी ही हालत है। दशकों बाद भी इनकी लाचारी दूर नहीं हुई है। इनके लिए धरती की कोख का पानी अभिशाप बना हुआ है। फ्लोरोसिस के चलते लगभग हर घर के एक न एक सदस्य के हाथ-पैरों की हड्डियां कमान की तरह से मुड़ गई हैं। पैरों में सूजन और दर्द तो लगभग हर शख्स की शिकायत है। 70 साल के बुजुर्ग से लेकर 10 साल तक के बच्चे इस दंश को झेल रहे हैं। पेश है इस गांव के लोगों की लाचारी को बयां करती राजीव शर्मा की यह रिपोर्ट...
आगरा। ‘यहां पीने योग्य पानी की व्यवस्था है’...भीषण गर्मी में आपने यह तो जगह-जगह लिखा देखा होगा, लेकिन शायद यह नहीं कि ‘यह पानी पीने योग्य नहीं है।’ पट्टी पटगाईं और खेड़ा पचगाईं में सरकारी पानी की टंकियों पर यही लिखा हुआ है। ‘जहरीले’ होते पानी का सेवन रोकने के लिए तो हैंडपंपों पर लाल निशान तक लगा दिए हैं। लेकिन लोग इस पानी को पीने को मजबूर हैं। जल निगम ने समस्या के समाधान के लिए गांव में पानी की टंकियां भी रखवाईं, लेकिन इसमें भी फ्लोराइड काफी मात्रा में था। ऐसी स्थिति में जल निगम को अपनी ही टंकिंयों और हैंडपंप के पानी को ‘फेल’ करना पड़ा। वर्तमान में पूरा गांव भूमिगत पानी पर ही निर्भर है। दूसरा कोई और स्त्रोत नहीं है। जल निगम सब कुछ जानते हुए भी गांव में पानी के लिए वैकल्पिक बंदोबस्त नहीं कर सका है। यह स्थिति तब है जबकि प्रदेश में समाजवादी सरकार में यह गांव लोहिया ग्राम में चयनित है।
केस: एक
70 वर्षीय बादामी पिछले 20 साल से अपने पैरों पर खड़ी नहीं हो पाई हैं। पानी ने उनके दोनों पैर उसने छीन लिए हैं। शुरुआत में उनकी ऐसी नहीं थीं। बताती हैं कि बचपन में उनके पैर बिलकुल ठीक थे। शादी के बाद जब वे पट्टी पचगाईं आईं तो उसके कुछ साल बाद से ही पैरों में तकलीफ शुरू हो गई।
केस: दो
30 वर्षीय लोहरे पिछले दो साल से कमर के बल खिसककर चल रहा है। बताता है कि इससे पहले उसके पैरों में टेढ़ापन तो शुरू हो गया था, लेकिन चल-फिर सकता था। अब वह दैनिक कार्यों के लिए भी दूसरों पर निर्भर है। वह कहता है कि पानी की कोई दूसरा व्यवस्था नहीं है। ऐसे में मजबूरी में यही पानी पीना पड़ता है।
केस: तीन
10 वर्षीय रोहित के तीन साल पहले हाथ और पैर उसका साथ छोड़ गए। उसकी मां चंद्रवती बताती है कि बचपन में वह बिलकुल ठीक था। मगर, कुछ साल पहले उसके हाथ-पैरों में दिक्कत होने लगी। चिकित्सक को दिखाया तो उसने पानी की वजह से यह दिक्कत बताई। अब उसका बेटा चल नहीं पाता है।
कम हो रही खेतों की उर्वरक क्षमता
एक तरफ भूमिगत पानी की वजह से लोग परेशान हैं, दूसरी तरफ देवरी रोड स्थित सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट उनकी खेती को बर्बाद कर रहा है। इस ट्रीटमेंट प्लांट से गंदा पानी सीधे कच्चे नाले में छोड़ दिया जाता है, इसकी वजह से पट्टी खेड़ा के खेतों में फसल को नुकसान पहुंचता है। किसानों का कहना है कि केमिकल युक्त इस पानी की वजह से उनकी आधी फसल बर्बाद हो जाती है।
फल-फूल रहा आरओ पानी का धंधा
पट्टी पचगाईं में ही नहीं शहर के भूमिगत पानी में भी फ्लोराइड है। यही वजह है कि अधिकांश लोग अपनी कमाई का एक बहुत बड़ा हिस्सा पानी पर खर्च कर रहे हैं। कम ही लोग होंगे जो भूमिगत पानी पीते हों। अधिकांश लोग आरओ पानी की बीस लीटर की बोतल खरीदते हैं।
जिलेभर में ठीक नहीं है पानी
ये अलग बात है कि पट्टी पचगाईं में भूमिगत पानी से काफी बुरे हालात हैं लेकिन पानी में फ्लोराइड की समस्या पूरे जिलेभर में है। शहर में लगे सबमर्सिबल पंप और हैंडपंप के पानी में भी फ्लोराइड है। इसकी वजह से अधिकांश लोगों को फ्लोरोसिस की शिकायत है।
पानी में फ्लोराइड अधिक होने की वजह से हैंडपंपों पर लाल निशान लगाए गए हैं। इनका पानी पीने योग्य नहीं है। शासन को नई योजना भेजी गई है। इसके अंतर्गत एक ऐसी जगह तलाशी जाएगी, जहां भूमिगत पानी में फ्लोराइड नहीं हो। इस पानी को टंकी के माध्यम से गांव में सप्लाई किया जाएगा।
- आरके यादव, एक्सईएन, जल निगम
गांव में पानी के एक शोधन प्लांट लगाने की मांग की गई है। इसी शोधित पानी की गांव में सप्लाई की जाए। साथ ही सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट से निकलने वाले गंदे पानी को भी गांव से दूर निकालने की व्यवस्था करनी होगी।
राधेश्याम, प्रधान, पचगाईं