मणिपुरी, असमी या फिर मिजो जैसे अहिंदी निवासी भी सहजता से हिंदी सीख सकेंगे। हिंदी से जोड़कर इनकी भाषाओं के शब्द कोश (अध्येता कोश) तैयार किए जा रहे हैं। संस्थान और साहित्य अकादमी की ओर से आयोजित पूर्वोत्तर तथा उत्तरी लेखक सम्मेलन में अहिंदी क्षेत्रों में हिंदी के प्रसार पर विद्वानों ने विचार रखे। दो दिवसीय कार्यक्रम के पहले दिन 42 अहिंदी लेखकों के साथ 80 साहित्यकार जुटे। अध्यक्षीय उद्बोधन देते हुए केंद्रीय हिंदी संस्थान के निदेशक प्रो. नंदकिशोर पांडे ने कहा कि शुरुआत में आठ राज्यों असम, अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम, मिजोरम, मेघालय, मणिपुर, त्रिपुरा और नागालैंड के लिए कोश तैयार होंगे। मुख्य अतिथि हिंदी परामर्श मंडल के संयोजक सूर्यप्रसाद दीक्षित ने हिंदी और प्रमुख जनजाति भाषाओं के तुलनात्मक अध्ययन पर कहा कि सभी भाषाओं में अपनापन है। दूसरी भाषाओं के मेल से ही हिंदी बढ़ेगी। सम्मेलन में त्रिपुरा की डा. मिलनरानी जमातिया, बलिया के डा. धर्मदेव तिवारी, कुलसचिव डा. चंद्रकांत त्रिपाठी, देवेंद्र कुमार देवेश, डा. त्रिभुवन नाथ शुक्ल, डा. हरीशंकर आदि रहे।
कहानी में छाई रही आधुनिक श्रवण कुमार
- दूसरे सेशन में हुए कहानी पाठ में असम, पंजाब, राजस्थान, मणिपुर से आए लेखकों ने कहानी सुनाई। ऊषा यादव की आधुनिक श्रवण कुमारों की कहानी की सभी ने सराहना की। जिसमें दो पुत्र अपनी मृत मां के शव को पहचानने से भी मना कर देते हैं। लेखक की इस मार्मिक कहानी को सुन कई लोगों की आंखें ही नम हो गईं।
मिजोरम में हिंदी लर्निंग कोर्स
- मिजोरम की डा. लुईस हउन्हार ने बताया कि वे 10 साल से हिंदी लर्निंग सेंटर चला रही हैं। हिंदी की लोकप्रियता ऐसी है कि दिन में 40 छात्रों की तीन शिफ्ट चलानी पड़ती है। आगरा विश्वविद्यालय से पीएचडी करने वाली डा. लुईस बोलीं कि मिजोरम में हिंदी युवाओं को ज्यादा प्रभावित कर रही है।
प्रेम की भाषा है हिंदी
मणिपुर के एच. बेहारी सिंह बोले कि बोलियां कोई भी हों, हिंदी प्यार की भाषा है। हिंदी सिनेमा ने हिंदी के प्रचार-प्रसार में बड़ा योगदान दिया है। भारत के किसी भी कोने में रहिए, हिंदी सभी को जोड़ती है।
विकास चाहती हैं कश्मीरी
कश्मीर के बिगड़ते हाल के लिए वहां बेरोजगारी और पिछड़ापन जिम्मेदार है। कश्मीर के लेखक नजीर अहमद नजीर बोले कि सहिष्णुता-असहिष्णुता से बड़ा मुद्दा विकास, रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य हैं।
क्या बतलाएं हमने कैसे...
- क्या बतलाएं हमने कैसे...सांझ सेवेरे देखे हैं...वरिष्ठ कवि सोम ठाकुर की इन पंक्तियों को सुन सभी वाह-वाह करने लगे। अंतिम सत्र में काव्यपाठ में नेपाल के आदर्श मिलन प्रधान ने कैलेंडर बदल जाते हैं हम नहीं...सुनाकर सभी का ध्यान खींचा। बलराम शुक्ल ने संस्कृत में कविता का हिंदी में अर्थ बताया।