‘कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता, कहीं जमीं तो कहीं आसमां नहीं मिलता’, जिंदगी के फलसफे को बयां करने वाले निदा फाजली के निधन से साहित्य जगत में शोक की लहर है। वह मीर, गालिब और नजीर की जमीं पर अपनी शेर-ओ-शायरी से कई बार प्यार-मोहब्बत और भाईचारे का पैगाम दे चुके हैं।
मशहूर शायर निदा फाजली के निधन की खबर सोमवार को जैसे ही मिली, ताजनगरी के साहित्य जगत के लोग स्तब्ध रह गए। खासतौर से वे, जो कई बार निदा के साथ मंच पर कविता पाठ कर चुके थे। ऐसे ही वरिष्ठ कवि सोम ठाकुर इस खबर के बाद कुछ देर के लिए मानो शून्य में चले गए। गहरी-लंबी सांस लेने के बाद डबडबाई आंखों को मलते हुए बोले, एक प्रगतिशील विचारधारा वाला शायर चला गया। कहते हैं, निदा के शेरों का आसमान इतना ऊंचा था कि वे कभी हिंदू-मुस्लिम में बंध कर नहीं रहे। जिस शिद्दत से ‘वृंदावन के कृष्ण कन्हैया अल्लाह हू, बंसी राधा गीत गैय्या अल्ला हू’ लिखा है, उसी मनोभाव से ‘मस्जिदों-मंदिरों की दुनिया में, मुझको पहचानते कहां हैं लोग, रोज मैं चांद बन के आता हूं, दिन में सूरज सा जगमगाता हूं’ जैसे शेरों के माध्यम से इंसानियत की नसीहत दी है।
चित्रांशी (याद-ए-फिराक) के अध्यक्ष केसी श्रीवास्तव उन लोगों में से हैं, जिनकी वजह से काव्य के शौकीनों को निदा फाजली से रूबरू होने का मौका मिला। उन्होंने अपने वार्षिक आयोजनों में दो बार निदा को आमंत्रित किया। वह कहते हैं, निदा की कमी को पूरा नहीं किया जा सकता। वे इतने अच्छे शायर थे, उससे कहीं बेहतर इंसान थे। हिंदी और उर्दू पर उनकी समान पकड़ थी। ‘होश वालों को खबर क्या बेखुदी क्या चीज है, इश्क कीजे फिर समझिए जिंदगी क्या चीज है’, प्यार के मौसम (वेलेंटाइन वीक) में ऐसे रूहानी शेरों से इश्क को बयां करने वाले शायर शायद अब अपने शब्दों से मोहब्बतों को मुकम्मल होने का अहसास न करा सकें।