कासगंज के सोरों क्षेत्र में गंगा किनारे बसा गांव कादरबाड़ी गंगा जमुनी तहजीब की मिसाल है। यहां रहने वाले मुस्लिम परिवार भले ही पेट के लिए अपने हाथ भट्टी में तपा रहे हों, लेकिन शिव की गंगाजली तैयार कर यह परिवार समाज को भाईचारे का संदेश दे रहे हैं।
इन मुस्लिम कारीगरों द्वारा बनाई गई गंगाजली में जल लेकर जब कांवड़िये बम भोले बम भोले के गीत गुनगुनाते हुए आगे बढ़ते हैं तो भाईचारे की खुशबू महकती है। कादरबाड़ी गांव के यह परिवार वर्षों से अपने हाथों से कांच को आकार देकर गंगाजली तैयार करने में जुटे हुए हैं।
मुस्लिम परिवार कांच को आग में तपाकर अंगुलियों से गंगाजली को आकार देते हैं। प्रतिदिन 16 घंटे तक काम करने वाले कारीगरों को इतना मुनाफा नहीं होता कि वो अपने परिवार का अच्छे से भरण पोषण कर सकें। यह काम सीजनल होता है, जो कांवड़ मेले के दिनों ही होता है।
पुश्तैनी काम है गंगाजली बनाना
अब यह धंधा उनके लिए घाटे का सौदा साबित हो रहा है, लेकिन गंगाजली तैयार करना इन मुस्लिम परिवारों का पुश्तैनी काम है। इसलिए इसे बंद भी नहीं करना चाहते। कांवड़ मेले के बाद इन मुस्लिम परिवारों को मजदूरी पर ही निर्भर रहना पड़ता है।
गंगाजली बनाने वाले कारीगर गुड्डू बताते हैं कि वो फिरोजाबाद से कांच मंगाकर सांचे से गंगाजली तैयार करते हैं। इस कारोबार में 10 परिवारों के करीब 50 लोग शामिल हैं। सालभर तो यह काम नही होता, लेकिन सावन, शिवरात्रि से पहले गंगाजली की डिमांड बढ़ जाती है।
कारीगर आसिफ ने बताया कि लगभग 50 हजार गंगाजली तीन महीने में तैयार कर लेते हैं। कादरवाड़ी की गंगाजली सोरों, रामघाट के साथ अन्य स्थानों पर भेजी जाती हैं। इस कारोबार से इतना मुनाफा नही होता कि अच्छे से परिवार का भरण पोषण कर सकें।
कादरबाड़ी में बनने वाली कांच की गंगाजली का कारोबार यूं तो दूसरे राज्यों तक फैला हुआ है, लेकिन इससे जुड़े मुस्लिम परिवारों के खाते में सिर्फ मजदूरी ही आ पाती है। सरकार की ओर से भी इस उद्योग को बढ़ावा नहीं मिलता, जिससे यह विकसित हो सके।