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'होगा कोई ऐसा भी कि 'ग़ालिब' को न जाने...', वो शायर जो अपने 'अंदाज-ए-बयां' से अमर हो गया

Thu, 27 Dec 2018 04:15 PM IST
मुकेश कुमार न्यूज डेस्क, अमर उजाला आगरा
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मिर्जा गालिब
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'होगा कोई ऐसा भी कि 'ग़ालिब' को न जाने, शायर तो वो अच्छा है पर बदनाम बहुत है'। मिर्जा गालिब का यह शेर उनकी अहमियत और शोहरत को बयां कर रहा है। उर्दू और फारसी भाषा के मशहूर शायर मिर्जा गालिब की 27 दिसंबर को 221वीं जयंती है। 
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मिर्जा गालिब का 27 दिसंबर 1797 को आगरा में हुआ था। गालिब का असली नाम असदुल्ला खां गालिब था। 12 साल की उम्र से ही उर्दू और फारसी में लिखना शुरू कर देने वाले मिर्जा गाब कलम के जादूगर थे। 

13 वर्ष की आयु में गालिब का निकाह नवाब ईलाही बख्श की बेटी उमराव बेगम से करा दिया गया। निकाह के बाद वो आगरा से दिल्ली चले गए। जहां उनकी तमाम उम्र बीती। ऐसा कहा जाता है कि उनके सात बच्चे हुए, लेकिन उनमें से कोई भी जिंदा नहीं रहा सका। अपने इसी गम से उबरने के लिए उन्होंने शायरी का दामन थाम लिया।
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शायरी में झलकती है जिंदगी

गालिब ने अपनी शायरी से जिंदगी को बयां किया है। दुख, तकलीफ, परेशानियां, दुश्वारियां और खुशियों का उनसे रूठना-मनाना जिंदगी भर लगा रहा। यह सब उनकी शायरी में झलकता होता है। उनकी हर शेर दिल में उतर जाती है। 

मिर्जा गालिब ने 15 फरवरी 1869 को इस दुनिया को अलविदा कह दिया। उनका मकबरा दिल्ली के हजरत निजामुद्दीन इलाके में बनी निज़ामुद्दीन औलिया की दरगाह के पास ही है। गालिब भले आज दुनिया न हो, लेकिन अपनी शायरी से वो हर जहन में जिंदा हैं। 
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पढ़िए मिर्जा गालिब के चुनिंदा शेर

हजारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले
बहुत निकले मेरे अरमां, लेकिन फिर भी कम निकले।

हैं और भी दुनिया में सुख़न-वर बहुत अच्छे
कहते हैं कि 'ग़ालिब' का है अंदाज़-ए-बयाँ और।

या रब, न वह समझे हैं, न समझेंगे मेरी बात
दे और दिल उनको, जो न दे मुझको जबां और।

इशरत-ए-क़तरा है दरिया में फ़ना हो जाना
दर्द का हद से गुज़रना है दवा हो जाना।

मोहब्बत में नहीं है फ़र्क़ जीने और मरने का
उसी को देख कर जीते हैं जिस काफ़िर पे दम निकले।

इस सादगी पे कौन न मर जाए ऐ ख़ुदा, 
लड़ते हैं और हाथ में तलवार भी नहीं...।

ज़िंदगी अपनी जब इस शक्ल से गुज़री
हम भी क्या याद करेंगे कि ख़ुदा रखते थे।

तेरे वादे पर जिये हम, तो यह जान, झूठ जाना,
कि ख़ुशी से मर न जाते, अगर एतबार होता।

बस-कि दुश्वार है हर काम का आसाँ होना 
आदमी को भी मयस्सर नहीं इंसाँ होना।

कहाँ मय-ख़ाने का दरवाज़ा 'ग़ालिब' और कहाँ वाइज़ 
पर इतना जानते हैं कल वो जाता था कि हम निकले।
 
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