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गुलजार रहने वाले केंद्र पर रही शांति: सूजी की यादों को जिंदा रखेगी आम की मिठास, वृद्धावस्था में हथिनी की मौत

Tue, 01 Oct 2024 03:32 PM IST
भूपेन्द्र सिंह राहुल दक्ष, आगरा

सार

वृद्धावस्था में हथिनी की मौत हो गई है। इसके बाद अठखेलियों और चिंघाड़ से गुलजार रहने वाले हाथी संरक्षण केंद्र पर शांति रही। हथिनी सूजी की यादों को आम की मिठास जिंदा रखेगी।
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हथिनी सूजी - फोटो : संवाद
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विस्तार
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उत्तर प्रदेश के आगरा में हाथियों की अठखेलियों और चिंघाड़ से गुलजार रहने वाले हाथी संरक्षण केंद्र, चुरमुरा में सोमवार को शांति थी। हर समय कुछ न कुछ खाते रहने वाले यहां निवासित 32 हाथी गमगीन थे। कुछेक पानी में शांत बैठे थे। डायरेक्टर से लेकर स्टाफ तक सब गमजदा थे। सभी को हथिनी सूजी के मरने का गम था। सभी की जुबां पर उसकी यादें और किस्से थे। सूजी की यादों को जीवन भर सहेजने के लिए यहां आम का एक पेड़ सूजी की कब्र पर लगाया जाएगा। पेड़ की देखभाल का जिम्मा महावत बाबूराम ने अपने हाथ में लिया है।

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74 वर्षीय हथिनी सूजी रविवार तड़के 4:05 बजे मर गई। दोपहर बाद सात डॉक्टरों की टीम ने पोस्टमार्टम किया। रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि वृद्धावस्था के कारण सूजी मर गई। शव को 10 फीट लंबाई, चौड़ाई व गहराई का गड्ढा खोदकर हाथी संरक्षण केंद्र के परिसर में डिस्पेंसरी के पास दफनाया गया। केंद्र के डायरेक्टर डा. बैजू राज एमवी ने बताया कि शव पूरी तरह से मिट्टी में करीब छह माह में मिल जाएगा। सोडियम क्लोराइड (नमक) भी डाला गया है। शासन को रिपोर्ट भेज दी गई है।

सूजी की आंखें थी आशा, छा गई निराशा

सूजी की सात साल से देखभाल करने वाले महावत बाबूराम ने बताया कि 10 वर्ष पहले सूजी को आंध्र प्रदेश के एक सर्कस से रेस्क्यू कर यहां लाया गया था। यातनाओं की वजह से वह नेत्रहीन हो गई थी। वह प्यार से सूजी को पारो बुलाते थे, सूजी नाम सर्कस वालों ने रखा था। पारो पुकारने के पीछे कारण भी यही था कि सूजी नाम से जुड़ी सर्कस संचालकों की यातनाएं वह भूल जाए। 
 

सूजी की केंद्र में सबसे अच्छी दोस्त आशा हथिनी थी। उसे भी एक सर्कस से रेस्क्यू किया था। सूजी देख नहीं सकती थी। वह हमेशा आशा के साथ घूमती थी। एक तरह से आशा उसकी आंखें थी। दो साल पहले आशा के मरने के बाद से सूजी निराश रहने लगी थी। उम्र बढ़ने से सूजी के दांत भी गिर गए थे। वह सिर्फ फल, दलिया, रागी ही खा पाती थी।
 

महावत ने नहीं खाया खाना

महावत बाबूराम बेहद गमगीन हैं। रविवार से उन्होंने खाना नहीं खाया। चर्चा छिड़ते ही वह रोने लगते हैं। शव दफनाने से पहले वह सूजी के शव से लिपटकर खूब रोए। बाबूराम ने बताया कि वह 65 वर्ष के हैं। हरियाणा के होडल के गांव सोन के निवासी हैं। दस वर्ष के थे, तब उनके गांव में एक बाबा हाथी लेकर आया था। उस हाथी को बाबा के चंगुल से छुड़ाया था। इसके बाद हाथी संरक्षण केंद्र से जुड़ गए। चुरमुरा केंद्र में चंपा हाथी के महावत के रूप में 2010 में आए।
 

65 साल झेली यातनाएं

केंद्र के डायरेक्टर डा. बैजू राज एमवी ने बताया कि सूजी हथिनी की मौत का गम है। मगर, एक सुकून यह भी है कि वह अपनी पूरी उम्र जी सकी। करीब 65 साल तक उसे सर्कस में यातनाएं झेलनी पड़ीं। उम्र में सबसे बड़ी थी, तो वैसा ही व्यवहार करती थी।
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महावत की जुबानी आखिर पल

महावत बाबूराम ने बताया कि शनिवार को दिन में सूजी सामान्य थी। खाना भी खाया। शाम को उनके साथ टहलने गई। रात आठ बजे खाद्य सामग्री छोड़कर वह आराम करने चले गए थे। रात करीब तीन बजे आंख खुली तो सूजी को देखने गए। वह बैठी थी। तड़के 4:05 बजे पहुंचे तो सूजी के शरीर में कोई हलचल नहीं थी। डायरेक्टर ने डॉक्टर को भेजा। डॉक्टर ने मरा घोषित कर दिया। एक पल तो कानों पर यकीन ही नहीं हुआ।

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