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Agra News: कटोरीदेवी ने रेल की पटरी उखाड़ हिला दी थी ब्रिटिश हुकूमत

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मैनपुरी। आजादी के आंदोलन में कई गुमनाम नायकों ने अपने प्राणों की आहुति दी। मगर, कुछ ऐसे भी नाम हैं जिन्होंने अपने अदम्य साहस से इतिहास में अपनी जगह बनाई। बरनाहल की रहने वाली कटोरीदेवी गुप्ता इन्हीं में से एक थीं, जिन्होंने देश की आजादी के लिए ब्रिटिश शासन का खुलकर विरोध किया था। रेल की पटरी को उखाड़ दिया था। यह मैनपुरी की रहने वाली एकमात्र महिला स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थीं।
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वर्ष 1942 में महात्मा गांधी के ''भारत छोड़ो'' आंदोलन के दौरान क्रांतिकारियों ने ब्रिटिश शासन को कमजोर करने के लिए ताखा स्टेशन (वर्तमान फिरोजाबाद जिले की सीमा के पास) पर रेल की पटरी उखाड़ दी थी। इस महत्वपूर्ण घटना में कटोरीदेवी ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। उन्होंने बरनाहल का डाकघर जलाने में भी क्रांतिकारियों का साथ दिया था। क्रांतिकारी गतिविधियों में शामिल होने के बाद कटोरीदेवी को ब्रिटिश पुलिस से बचने के लिए कई रातें खेतों में छिपकर गुजारनी पड़ीं। डाकघर जलाने के बाद वे बैलगाड़ी से कोसमा रेलवे स्टेशन गईं और वहां से अपने मायके फर्रुखाबाद चली गईं। उनके पिता रंधूलाल गुप्ता ने उन्हें फतेहगढ़ सेंट्रल जेल में हाजिर कराया, जहां उन्हें एक साल तक रहना पड़ा था। कटोरीदेवी के पति प्रभूदयाल और जेठ श्रीदयाल गुप्ता भी स्वतंत्रता सेनानी थे और उन्होंने भी जेल काटी थी। उनके घर में क्रांतिकारी आया-जाया करते थे और वे कोसमा में रहने वाले रामप्रसाद बिस्मिल के संपर्क में भी थे।



परिवार को वह सम्मान नहीं मिला, जिसके वे हकदार थे। सुझाव है कि स्वतंत्रता सेनानियों के सम्मान में उनके गांव या शहर में किसी सरकारी संस्थान का नाम रखा जाना चाहिए।
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- प्रकाशचंद्र गुप्ता, कटोरीदेवी के बेटे


467 स्वतंत्रता सेनानियों को मिला सम्मान, हजारों रह गए वंचित

संवाद न्यूज एजेंसी

मैनपुरी। देश को आजादी दिलाने में मैनपुरी के स्वतंत्रता सेनानियों की महत्वपूर्ण भूमिका रही। हजारों वीरों ने आजादी के संग्राम में आहुतियां दीं। मगर, मैनपुरी में इनमें से केवल 467 स्वतंत्रता सेनानियों को ही सम्मान मिल पाया। आजादी के 28 साल बाद यानी 1975 में जब राज्य सरकार ने पेंशन योजना शुरू की तब मैनपुरी में सिर्फ 467 स्वतंत्रता सेनानियों की पहचान हो पाई थी। जबकि जिले के इतिहासकार और खुद प्रशासनिक लोग भी मानते हैं कि करीब 3 हजार लोगों ने स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई थी। मगर, इनमें से अधिकांश गुमनामी के अंधेरे में खो गए।



पेंशन के लिए करना पड़ा 28 साल का इंतज़ार
आजाद भारत में भी स्वतंत्रता सेनानियों को पेंशन पाने के लिए लंबा इंतज़ार करना पड़ा। 1975 में प्रदेश की कांग्रेस सरकार ने पेंशन योजना शुरू की और 467 जीवित स्वतंत्रता सेनानियों को पहली बार पेंशन दी गई। 1980 में केंद्र सरकार ने भी पेंशन देने का ऐलान किया। शुरुआत में राज्य सरकार ने 1000 और केंद्र सरकार 1800 रुपये की पेंशन देती थी। पेंशन के नियम अनुसार स्वतंत्रता सेनानी की मृत्यु के बाद यह पेंशन उनकी पत्नी को दी जाती थी, लेकिन पत्नी की मृत्यु के बाद इसे बंद कर दिया जाता था। आज की स्थिति यह है कि जिले में एकमात्र जीवित स्वतंत्रता सेनानी के रूप में कात्यायनी देवी पेंशन पा रही हैं। वे मूल रूप से मिर्जापुर की रहने वाली हैं और मैनपुरी के स्वतंत्रता सेनानी महेशचंद्र वर्मा के संपर्क में आने के बाद से कुरावली में रह रही हैं। कात्यायनी देवी बताती हैं कि यह स्थिति उन हजारों गुमनाम नायकों की कहानी बयां करती है, जिनके योगदान को आज भी पहचान नहीं मिल पाई है।



आजादी के आंदोलन में जिले के 3 हजार के करीब लोगों ने भाग लिया। कई क्रांतिकारियों की तो आजाद भारत में मृत्यु हो गई। इसके चलते उनको पेंशन का लाभ नहीं मिल सका। कई क्रांतिकारी गुमनामी के अंधेरे में खो गए। लंबे समय से हर जिले के स्वतंत्रता सेनानियों की याद में शिला पट्टिका लगवाने की मांग आज तक शासन स्तर पर लंबित ही है। स्वतंत्रता सेनानियों की याद सहेजने के लिए कुछ तो यादगार होना चाहिए।
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- मुन्नालाल कश्यप, अध्यक्ष स्वतंत्रता सेनानी उत्तराधिकारी संगठन
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