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पुण्यतिथि पर विशेष : ताजनगरी में 11 दिन रुके थे राष्ट्रपिता, खादी अपनाने का दिया था संदेश

Sat, 30 Jan 2021 04:54 AM IST
Abhishek Saxena न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा
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महात्मा गांधी - फोटो : फाइल फोटो
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राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ताजनगरी में 11 दिन रुके थे। वह आए तो स्वास्थ्य लाभ लेने के लिए थे लेकिन हर पल स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन को तेज करने के लिए काम करते थे। उनसे जो भी मिलने जाता, उसे खादी पहनने के लिए प्रेरित करते। बापू की प्रेरणा से विदेशी कपड़ों को लोगों ने न केवल त्यागा, बल्कि जगह-जगह होली भी जलाई थी।
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कार्यक्रम में बोलते हुए स्वतंत्रता सेनानी रानी सरोज गौरिहार - फोटो : अमर उजाला
स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रानी सरोज गौरिहार बताती हैं कि  पिता जगन प्रसाद रावत उन्हें बापू के आगरा से जुड़े किस्से सुनाते थे। बापू आगरा में कई बार आए थे। सबसे ज्यादा समय 1929 में दिया। वह 14 सितंबर 1929 को आए थे और 11 दिन रहे। एत्माद्दौला में एक बगीची में रुके थे। उनसे मिलने के लिए देश और आगरा के नेता आते थे।

यहां रुके थे गांधीजी - फोटो : अमर उजाला
वह चरखे से सूत कातते रहते थे। जो भी मिलने आता था, उसे खादी अपनाने के लिए प्रेरित करते। उनका चरखा पालीवाल पार्क स्थित जोंस लाइब्रेरी में संरक्षित है। वह जिस स्थान पर रुके थे, वहां बाद में गांधी स्मारक बनाया गया। उनके जाने के बाद आगरा में कई जगह विदेशी कपड़ों की होली जलाई गई थी। इसके बाद बापू 1040 में आए। तब वह ट्रेन से जा रहे थे। उन्होंने बापू को बहुत करीब से देखा। इससे पहले बापू 1917 में एक दिन लिए अयोध्यानाथ कुंजरू के आवास पर रुके थे। 1920 में बेलनगंज में गिरधारी लाल वकील के यहां रुके थे। तब उन्होंने छात्रों से कहा था कि आजादी हमारा हक है, हम इसे लेकर रहेंगे।
 

महात्मा गांधी और बा। - फोटो : अमर उजाला
‘मिल के कपड़े में छना दूध बापू के काम का नहीं’
रानी सरोज गौरिहार बापू से जुड़े किस्से बताती हैं। 1929 में एक बार कस्तूरबा गांधी ने बताया कि बकरी का दूध खत्म हो गया है। बापू बकरी के सिवाय किसी और का दूध नहीं लेते थे। दही भी बकरी से बने दूध का ही लेते थे। कांग्रेसी रात में कई गांव में घूमे और लोटा भर बकरी का दूध ले आए। सुबह किसी ने इस दूध को मिल के बने कपड़े में छान दिया था। यह देख कस्तूरबा ने कहा था, यह दूध अब बापू के काम का नहीं रहा। वह मिल के बने कपड़े किसी भी रूप में इस्तेमाल नहीं करते थे।
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Mahatma Gandhi
बात रुकने के नहीं, विचारों के टूट जाने की है
गौरिहार एक और किस्सा बताती हैं। 1927 में जब बापू आए तो वह उनके पिता जगन प्रसाद रावत के साथ जा रहे थे। रास्ते में किसी ने कहा कि बापू का स्वागत करना है, गाड़ी रुकवा दो। पिता ने गाड़ी रुकवा दी। बापू को माला पहनाकर वह चला गया। इस पर बापू नाराज हो गए थे। उन्होंने कहा था कि यह बहुत गलत किया, बात रुकने की नहीं है, कोई विचार मन में चल रहा था, वह टूट गया। विचारों के क्रम का टूटना बहुत गलत है।
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