तेज डीजे और शोरगुल से रक्तचाप व हृदय की धड़कन प्रभावित हो सकती है, खासकर हृदय रोग और उच्च रक्तचाप के मरीजों के लिए खतरा बढ़ सकता है। ईएनटी विशेषज्ञों के अनुसार 60 डेसिबल से अधिक शोर परेशानी पैदा कर सकता है, जबकि 100-140 डेसिबल की आवाज कानों के लिए गंभीर रूप से नुकसानदेह हो सकती है।
तेज आवाज और बढ़ता शोरगुल बीपी और धड़कन बढ़ा रहा है। इससे कार्डियक अरेस्ट का खतरा अधिक है। बलरामपुर में डीजे की तेज आवाज के चलते ही बच्ची की जान चली गई। एसएन मेडिकल कॉलेज के ईएनटी रोग और हृदय रोग विभाग की ओपीडी में परेशानी के मरीज आ रहे हैं।
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एसएन मेडिकल कॉलेज के हृदय रोग विभाग के डॉ. सौरभ नागर ने बताया कि अत्यधिक तेज आवाज से हृदय की कार्य गति असंतुलित होने लगती है। मरीज का रक्तचाप बढ़ने से धड़कनें भी दोगुना से अधिक हो जाती हैं। इससे हृदय तेज गति से संचालित होने लगता है और कार्डियक अरेस्ट होने का तीन गुना खतरा बढ़ जाता है। ब्रूगाडा सिंड्रोम से पीड़ित मरीज के लिए तो तेज आवाज जानलेवा है। इसमें एड्रीनलीन हॉर्मोन्स का स्तर बढ़ जाता है। ये हृदय की विद्युत प्रणाली को प्रभावित करता है। इससे हृदय की कोशिकाओं में सोडियम चैनल के कार्य को बाधित करता है।
इससे हृदय की धड़कन तेज गति से होने लगती है। इसे वेंट्रिकुलर फिब्रिलेशन बोलते हैं। इस स्थिति में हृदय खून की पंपिंग करना बंद कर देता है, जिससे मरीज की अचानक मौत हो जाती है। इमरजेंसी में ऐसे मरीज आते हैं। एसएन के मेडिसिन विभाग के डॉ. प्रभात अग्रवाल ने बताया कि अत्यधिक शोरगुल मरीज के रक्तचाप पर सीधा प्रभाव डालता है। इससे बीपी डेढ़ गुना तक बढ़ सकता है। इससे उच्च रक्तचाप और बुजुर्ग मरीजों के लिए अधिक खतरा है। खटीकपाड़ा क्षेत्र निवासी सेवानिवृत्त वायु सेना के अधिकारी आरके कश्यप (91) का कहना है कि डीजे के शोर से बुजुर्गों को अधिक परेशानी हो रही है। शासन के नियमों की भी अनदेखी की जा रही है।
60 डेसिबल से अधिक आवाज नुकसानदेह
एसएन की ईएनटी रोग विभागाध्यक्ष डॉ. रीतु गुप्ता ने बताया कि 40-60 डेसिबल की आवाज कानों के लिए बेहतर है। 60-90 डेसिबल की आवाज कानों में परेशानी कर सकती है। नींद प्रभावित होने से थकान और चिड़चिड़ापन होता है। 100-140 डेसिबल की आवाज डीजे, रॉक कॉन्सर्ट, सायरन समेत अन्य की होती है। इससे कान का पर्दा फट सकता है। हृदय रोग, उच्च रक्तचाप के मरीजों के लिए भी ज्यादा खतरनाक है।