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पहलः लॉकडाउन में मृत्युभोज बंद... हमेशा के लिए छोड़ें कुप्रथा, उठी आवाज

Thu, 23 Apr 2020 03:23 PM IST
Abhishek Saxena न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा
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मृत्युभोज का फाइल फोटो - फोटो : अमर उजाला
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आगरा में फतेहपुर सीकरी के कटरा शिवदास निवासी व्यवसायी प्रदीप गर्ग की मां सरोज देवी का स्वर्गवास 19 मार्च को हो गया था। त्रयोदशी पर 30 मार्च को घर में ही हवन और कन्याभोज कराया गया। इस मौके पर सिर्फ परिवारीजन ही मौजूद रहे। मृत्युभोज नहीं कराया गया।
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यह अकेला मामला नहीं है। लॉकडाउन में जिन परिवारों में भी गमी हुई है, उन्होंने मृत्युभोज नहीं दिया है। अछनेरा के गांव कचौरा निवासी लोचन सिंह, लाल सिंह, नेम सिंह की मां चंदा देवी (85) का निधन 10 अप्रैल को हुआ था। मृत्युभोज नहीं किया। वे मां की स्मृति में बाद में कोई सामाजिक कार्य करेंगे।

शमसाबाद निवासी रामबेटी पत्नी ओमप्रकाश का निधन 16 अप्रैल को बीमारी के कारण हो गया था। परिजनों ने लॉकडाउन को देखते हुए सिर्फ परिवारिजनों में रस्म पूरी की। कस्बा लादूखेड़ा के प्राथमिक विद्यालय के पूर्व प्रधानाध्यापक देवेंद्र कुमार शर्मा की पत्नी श्रीमती देवी का निधन 27 मार्च को हो गया
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था। त्रयोदशी संस्कार 6 अप्रैल को उन्होंने सिर्फ 11 कन्याओं को भोजन कराया था।
 

लोगों का कहना है कि कहीं से भी कोई सवाल नहीं उठा कि मृत्युभोज क्यों नहीं दिया? न ही किसी ने इसका बुरा माना। लॉकडाउन ने मौका दिया है मृत्युभोज की कुप्रथा को खत्म करने का। हर समाज में इसे बंद किए जाने की आवाज तो उठती रही हैं लेकिन खुलकर विरोध नहीं हो पाया।

इसलिए यह जारी रही। अब मजबूरी में ही सही, जिन परिवारों में गमी हुई, वे त्रियोदशी संस्कार में मृत्युभोज नहीं दे पाए। इसी से कुप्रथा पर अल्पविराम लगा। अब समाज के जिम्मेदार लोग चाहते हैं कि इस पर पूर्णविराम लग जाए। मृत्युभोज न दिए जाने का अब किसी ने बुरा नहीं माना, तो भविष्य में भी नहीं मानेगा। इसी सकारात्मक सोच के  अलग अलग समाज के संगठनों से आवाज उठी है कि मृत्युभोज को बंद किया जाए।

पूर्ण रूप से बंद किया जाए मृत्युभोज
अग्रवाल समाज हमेशा से मृत्युभोज के खिलाफ रहा है। यह एक कुप्रथा है, जो लंबे समय से चली आ रही है। अब लॉकडाउन में यह परंपरा टूटी है। इसे हमेशा के लिए खत्म कर देना चाहिए। यही समाज के हित में है - दिनेश बंसल कातिब, अध्यक्ष, अग्रवाल महासभा आगरा
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यह एक बुराई है, अब इसे खत्म करें
सिंधी समाज से आवाज उठती रही है कि मृत्युभोज बंद हो। यह एक बुराई है, मगर चली आ रही है। अब लॉकडाउन में मजबूरी में ही सही, लेकिन नई सोच विकसित हुई है। समाज से मृत्युभोज को पूरी तरह से खत्म करने पर काम करेंगे। - गागनदास रमानी, अध्यक्ष सेंट्रल पंचायत

यह बंद ही रहे तो अच्छा
जाट समाज की पंचायतों में मृत्युभोज का हमेशा विरोध हुआ है। यह एक कुरीति है। इसे मिटाना ही होगा। अब लॉकडाउन में यह बंद है तो हमारी कोशिश रहेगी कि यह बंद ही रहे। इसके लिए समाज के लोगों को प्रेरित करेंगे। जैसे अब मृत्युभोज बंद है, वैसे ही इसे आगे भी बंद ही रखेंगे। - कप्तान सिंह चाहर, जिलाध्यक्ष अखिल भारतीय महासभा
 
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