मेहनतकश मजदूर नहीं जानते हक-हुकूक की बातें, ये जानते हैं सिर्फ भूख की बातें। जब पेट की अंतड़ियां सूखती हैं तो क्रांति के नारे नहीं, रोटी के निवाले याद आते हैं। 'कोरोना काल' में कई दुश्वारियों के साथ इनका मजदूर दिवस सड़कों पर गुजर गया। लॉकडाउन में आगरा-जयपुर हाईवे से होते हुए घर जा रहे पप्पू को याद नहीं कि मजदूर दिवस कब है। उसे बस घर जाना है। उसके साथी गुड्डू के ये मार्मिक शब्द, ‘मजदूर एक कचरा है, और कुछ नहीं’ कलेजे को भेद देते हैं।
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जयपुर से बिहार जाने के लिए निकले मजदूर
- फोटो : अमर उजाला
दिन शुक्रवार, शाम छह बजे का वक्त था। आगरा-जयपुर हाईवे से साइकिल पर मास्क लगाए मजदूरों की टोली गुजर रही थी। पसीने में भीगे मेहनतकश छांव में थोड़ी देर बैठ गए। एक साथी की साइकिल का टायर पंक्चर हो गया। उसे भी जोड़ना है। इनमें से तीन-चार ने कर्ज लेकर नई साइकिल खरीदी है। सभी 28 अप्रैल को जयपुर से बिहार जाने के लिए निकले हैं। जिसका फासला करीब 1100 किमी है।
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बिहार के रहने वाले श्रमिक
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अवधेश और पप्पू यादव कहते हैं कि जयपुर में ढलाई फैक्ट्री में काम करते थे। लॉकडाउन में रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया। इसलिए निराश होकर हम लोग साइकिल से ही घर जाने के लिए निकल पड़े। बोले, क्या करते, डेढ़ महीने से बैठकर खा रहे थे। पैसे खत्म हो गए।
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बिहार के रहने वाले श्रमिक
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इन श्रमिकों ने बताया कि सरकार द्वारा भेजे गए हजार रुपये किसी को मिले, किसी को नहीं। भूख से मरने से अच्छा, अपने गांव चले जाएं। रास्ते में संस्थाओं ने खाना खिलाया। सीमा पर पुलिस वालों ने दूसरा रास्ता बता दिया। वहां से भटकते हुए यहां पहुंचे हैं। गांव वालों ने खाना खिलाया और मास्क भी दिए।
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बिहार के रहने वाले श्रमिक
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श्रमिक पप्पू ने बताया कि दिन में 50-60 किमी चलते हैं। फुटपाथ पर तीन-चार घंटे सोते हैं। पीने को गर्म पानी मिलता है। पैरों में छाले पड़ गए। पैर दर्द करता है पर हम हिम्मत नहीं हारेंगे। हमें अपने घर जाना है।
जयपुर से बिहार जाने के लिए निकले मजदूर
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गुड्डू बोला कि मजदूरों से सेठ, सरकार पैसे कमा लेती है। मजदूर एक कचरे के अलावा हैं ही क्या। हकीकत यही है। जब पूछा आज क्या है, सबका जवाब था चलते-चलते दिन भी भूल गए। जाने और खाने के सिवा कुछ याद नहीं। पंक्चर ठीक होने पर फिर आगे बढ़ चले। होंठों पर हौसलों की मुस्कान लिए बोले कि अच्छे से लिखना हमारी कहानी...।