कड़ाके की ठंड के बीच कोहरे को चीरकर गुरुवार को छलेसर के कट्टी खाने मैदान में परिंदों ने उड़ान भरी तो हर कोई देखता रह गया। मालिकों के हुकुम की तालीम पर अठखेलियां करते कबूतर आसमान में ऊंची उड़ान भर रहे थे। उनके पंखो की फड़फड़ाहट और गुटर गूं के बोल मालिकों की जीत का दम भर रहे थे।
कुलकुलबाजी का कुछ ऐसा ही नजारा गुरुवार को देखने को मिला। मुगलकालीन परंपरा पर आधारित प्रतियोगिता दोपहर एक बजे शुरू हुई। अलग-अलग टोली के मालिकों ने अपने कबूतरों की अलग पहचान रखी थी। किसी ने अपने कबूतरों पर सेंट छिड़की तो किसी ने रंग लगाया। कबूतरों के कई नाम भी रखे थे। उनका नाम पुकारकर अपनी चादर पर उतारा जाता गया था।
लगभग तीन हजार कबूतरों ने उड़ान भरी, जिनमें प्रतियोगिता में छह टोलियों ने हिस्सा लिया। फीरोजाबाद के बंटी उस्ताद व हाशिम उस्ताद ने 69, आगरा के कालू भाई, सूकी पहलवान व उस्ताद दिनेश चौधरी (बेगम ड्योड़ी) ने 83, संगू भाई, मौनू भाई व भूरा खलीफा (कोले की टाल प्रभु सिनेमा) ने 61, बालो भाई, नूर मोहम्मद खलीफा (बेगम ड्योढ़ी) ने 113, मोहम्मद सलीम उस्ताद, किच्चू उस्ताद (नाई की मंडी) ने 58, हौला उस्ताद (ताजगंज) ने 07 कबूतरों को अपने पाले में उतारा। पहले दिन की विजेता बालो भाई की टीम ने सर्वाधिक 113 कबूतर अपने पाले में उतारे। दूसरे दिन का मुकाबला छलेसर स्थित एक्सप्रेसवे के पास मैदान में होगा।
कारीगरी दिलाएगी जीत
आगरा, फीरोजाबाद कबूतरबाजी एसोशिएशन के अध्यक्ष दिनेश चौधरी ने बताया कि उस्तादों की कारीगरी उन्हें जीत का सेहरा पहनाएगी। वह सबसे ज्यादा कबूतर पकड़कर विजेता बनेंगे। 30 दिसंबर से पहले जो गाड़ी मैदान छोडे़गी उसे हारा हुआ माना जाएगा।