मोतीगंज बाजार का नाम देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के पिता मोतीलाल नेहरू के नाम पर है। मोतीलाल आगरा में वकालत करते थे। तब हाईकोर्ट भी आगरा में ही था। पहले इसका नाम सैमसन गंज था। सैमसन अंग्रेज अधिकारी था। उसके नाम पर यह नाम पड़ा था। यह बाजार जंग ए आजादी का गवाह है। स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की बड़ी रैलियां यहां हुई थीं।
इतिहासकार राज किशोर शर्मा राजे ने बताया कि वर्ष 1940 में नेताजी सुभाष चंद्र बोस यहां आए थे। उनके नारे ‘तुम मुझे खून दो-मैं तुम्हें आजादी दूंगा’ ने युवाओं में जोश भर दिया था। यहीं पर नेताजी ने अंग्रेजों के खिलाफ सशस्त्र युद्ध का संदेश दिया था। नौ अगस्त, 1942 को जुलूस निकालते क्रांतिकारियों पर अंग्रेज सिपाहियों ने गोली चलाई थी। युवक परशुराम शहीद हो गए थे।
अंग्रेजों को होती थी रसद की आपूर्ति
अंग्रेजों ने सैमसन गंज को रसद की आपूर्ति का केंद्र बनाया था। यहां से ही खाद्य सामग्री अन्य जगहों को भेजी जाती थी। भंडारण की भी व्यवस्था की गई थी।
व्यापार का प्रमुख केंद्र था आगरा
राजकिशोर राजे ने बताया कि मुगलिया दौर में आगरा व्यापार का बड़ा केंद्र रहा। अकबर के समय में देश का ही नहीं, एशिया के प्रमुख बाजार लाहौर और आगरा थे। अकबर के वजीर ए आजम रहे अबुल फजल ने भी इसका वर्णन किया है। दरी-गलीचे, शॉल, मसाले, हाथी दांत, सूती वस्त्र, लोहे के हथियार का कारोबार होता था। आगरा और सीकरी में सिक्कों की टकसालें थीं।
मंडियां ही नहीं, गंज और हाई भी
इतिहासकार सुगम आनंद ने बताया कि व्यापार को व्यवस्थित ढंग से चलाने के लिए अकबर के समय सिर्फ मंडियों की ही स्थापना नहीं की गई, बल्कि हाई और गंज भी बनाए गए। हाई ऐसी जगह होती थी जहां साप्ताहिक, पाक्षिक और मासिक बाजार लगते थे, जैसे नुनिहाई। इसी तरह गंज संभवत: वे स्थान थे, जहां सामान का भंडारण किया जाता था, जैसे ताजगंज, बेलनगंज, शाहगंज, आलमगंज, मोतीगंज।