जौहरी बाजार के नाम से लगता है कि यह हीरे-जवाहरात का बाजार है। मुगल काल में बिल्कुल ऐसा ही था। जौहरियों ने यहां दुकानें खोलीं और नाम पड़ गया जौहरी बाजार। जौहरी यहां इसलिए आए क्योंकि उस दौर में यह सबसे सुरक्षित इलाका समझा जाता था। किले और कोतवाली के बीच में यह बाजार बना था।
मुतामिद खां की किताब जहांगीरनामा में इसका उल्लेख है। इतिहासकार राज किशोर शर्मा राजे ने अपनी किताब तवारीख ए आगरा में भी इसका उल्लेख किया है। वह बताते हैं कि आज सेठ गली के पास जहां पोस्ट ऑफिस है, वहां मुगलों के वक्त में कोतवाली थी। जौहरी बाजार को बसाने में मुख्य भूमिका लौहारू वैश्य जाति के लोगों की रही।
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ये लोग जिस स्थान पर बसे, उसे लुहार गली कहा गया। जौहरी बाजार के पास ही एक पतली सी गली है। इसमें मुगलकाल में सेठ-साहूकार रहा करते थे। इसका नाम सेठ गली पड़ गया। हालांकि अब यहां मिठाई और कागज की दुकानें हैं लेकिन नाम सेठ गली ही है।
अब यहां कई चीजों की दुकानें
वक्त के साथ जौहरी बाजार की तस्वीर बदलती चली गई। सराफ के लिए और भी बाजार बन गए। जौहरी वहां से चले गए। जौहरी बाजार नाम का रह गया। अब यहां कई चीजों की दुकानें हैं। कुल मिलाकर यह मिलाजुला बाजार हो गया है।