दौर ए मुगलिया में बसाए गए मोहल्लों में से एक आलमगीर औरंगजेब ने बसाया था। इसे नाम दिया आलमगंज। बादशाह ने यहां एक मस्जिद भी बनवाई थी। इतिहास की किताबों में इस मुहल्ले का जिक्र मिलता है।
इतिहासकार राज किशोर राजे बताते हैं कि वर्ष 1671 में जब औरंगबेज मराठों से जूझ रहा था, तब उसने आलमगंज बस्ती बसाई थी। हालांकि यह इलाका इससे भी पहले का है। हो सकता है कि तब इसका कुछ और नाम रहा हो लेकिन नाम का जिक्र किताबों में नहीं मिलता है।
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हां, इतना जरूर है कि बादशाह अकबर के नवरत्न दो भाई अबुल फजल और फैजी यहां रहा करते थे। जब सल्तनत फतेहपुर सीकरी चली गई, तब दोनों वहां रहने लगे। इनकी बहन लाडली बेगम की शादी शेख सलीम चिश्ती के नाती इस्लाम खां से हुई थी। लाडली का इंतकाल वर्ष 1596 में हुआ। उसकी कब्र घर (आलमगंज) से एक मील दूर बनवाई गई।
सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल यह इलाका
मदिया कटरा से लोहामंडी की तरफ का घनी आबादी वाला इलाका आलमगंज है। यहां अभी भी पुरानी इमारतों के कुछ खंडहर हैं। बसाए जाने के बाद से यह इलाका सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल रहा। हालांकि 1992 में जब शहर में तनाव हुआ तो यहां से बड़ी संख्या में लोग घर छोड़कर चले गए।
एशिया का प्रमुख बाजार था आगरा-लाहौर, अबुल फजल ने भी इसका वर्णन किया
राजकिशोर राजे ने बताया कि मुगलिया दौर में आगरा व्यापार का बड़ा केंद्र रहा। अकबर के समय में देश का ही नहीं, एशिया के प्रमुख बाजार लाहौर और आगरा थे। अकबर के वजीर ए आजम रहे अबुल फजल ने भी इसका वर्णन किया है। दरी-गलीचे, शॉल, मसाले, हाथी दांत, सूती वस्त्र, लोहे के हथियार का कारोबार होता था। आगरा और सीकरी में सिक्कों की टकसालें थीं।