फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

कलंदरों से मुक्त कराए गए भालुओं पर टीबी की मार

Mon, 19 Dec 2016 12:32 AM IST
कलंदरों से मुक्त कराए गए भालुओं पर टीबी की मार
विज्ञापन
bear hunt
विज्ञापन
कलंदरों की कैद भालुओं की जान पर बन आई है। प्राकृतिक पर्यावास से दूर रखे जाने से ये भालू ट्यूबरकुलोसिस बैक्टीरियम (टीबी) जैसी जानलेवा बीमारी के शिकार हो रहे हैं। इस बीमारी के कारण छह महीने से डेढ़ साल में ही भालुओं की मौत हो जा रही है।
विज्ञापन

आगरा के सूर सरोवर पक्षी विहार में एनजीओ वाइल्ड लाइफ एसओएस के भालू संरक्षण केंद्र में कलंदरों से आजाद कराए गए 204 भालू रखे गए हैं। साल 2002 में स्थापित हुए इस संरक्षण केंद्र में अब तक 90 भालुओं की मौत हो चुकी है। इनमें से 50 भालू टीबी की बीमारी से मरे हैं। संस्था के डायरेक्टर एवं वन्य जीवों पर लंबे समय से काम कर रहे पशु चिकित्सक डॉ. वैजूराज बताते हैं कि भालुओं में संक्रमण इंसानों से ही पहुंचता है। संरक्षण केंद्र में टीबी से पीड़ित अधिकांश भालुओं की मौत 12 से 15 साल की उम्र में हुई है। टीबी के शिकार भालुओं में केवल एक छह साल जी पाया था जबकि बाकी 49 की मौत उपचार के दौरान छह महीने से डेढ़ साल के बीच हो गई।
डॉ. वैजूराज के मुताबिक टीबी से पीड़ित भालुओं का उपचार आसान नहीं है, क्योंकि इनको दवा की गंध पसंद नहीं है। टीबी से पीड़ित भालुओं को उनके खाने में दवा मिलाकर दी जाती है। ऐसे में दवा की गंध से दूर भागने वाले भालू भोजन करना ही छोड़ देते हैं। संरक्षण केंद्र में अभी भी टीबी के शिकार दो-तीन भालुओं का इलाज चल रहा है। उन्होंने बताया किभालू से इंसान में टीबी का संक्रमण नहीं पहुंचता है, बावजूद ऐहतियात के तौर पर इनकी देखरेख में लगे कर्मचारियों का हर महीने मेडिकल चेक अप होता है।
विज्ञापन

पशु चिकित्सकों के मुताबिक टीबी के बाद भालुओं के लिए दूसरी जानलेवा बीमारी लेपटॉस पाइरोसिस है, जिसका संक्रमण चूहों से फैलता है। एक बार भालू पार्क में इससे एक साथ 15 भालुओं की मौत हो गई थी। हालांकि वैक्सीन आने के बाद अब यह ज्यादा खतरनाक बीमारी नहीं रही है। संरक्षण केंद्र में भालुओं को रेबीज, लेपटोज पाइरोसिस, केनाइन हेपेटाइटिस समेत तमाम बीमारियों के बचाने के टीके लगाए जाते हैं।

आसान नहीं होता भालुओं को कलंदरों से छुड़ाना
वाइल्ड लाइफ एसओएस के देश में कई केंद्र हैं। इनमें लगभग 650 भालुओं का संरक्षण किया जा रहा है। संस्था के अधिकारियों के मुताबिक भालुओं को कलंदरों के कब्जे से छुड़ाना आसान नहीं होता। एक बार आगरा के कौरई गांव में कलंदरों ने पुलिस टीम के पहुंचते ही अपने भालू खोल दिए थे, जिससे पुलिसकर्मी संकट में घिर गए थे। वन विभाग कलंदरों के लिए पुनर्वास योजना भी चला रहा है। यदि कलंदर अपने भालू खुद वन विभाग को सौंपते हैं तो उन्हें प्रति भालू 50 हजार रुपये दिए जाते हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें