भक्ति और प्रेम की परंपरा वाले गंगा-जमुना के बीच बसे कासगंज की धरती पर सांप्रदायिक हिंसा की फैलती दुर्गंध ने हर किसी को स्तब्ध कर दिया है। गोस्वामी तुलसीदास और अमीर खुसरो को जन्म देने वाला जनपद पिछले 5 दिनों में हिंसा के लिए बदनाम हो गया है।
इस शहर ने इस जिले ने कई संवेदनशील समय देखे हैं। स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई भी यहां मिल जुलकर लड़ी गई। कासगंज, सोरों, पटियाली, गंजडुंडवारा, सहावर, अमांपुर जैसे सभी कस्बे बिना भेदभाव के अंग्रेजों के विरुद्ध खड़े हो जाते थे। न कोई जात पात थी और न कोई धर्म संप्रदाय। अंग्रेजों के खिलाफ मिलजुलकर जांबाजी के साथ संघर्ष किया।
कई सेनानी शहीद हुए। शहर और जिले ने आजादी को बहुत संभालकर रखा। स्वतंत्रता के बाद कई ऐसे अवसर आए। जब देशभर में दंगे हुए लेकिन कासगंज के नागरिक जिम्मेदारी के साथ एक साथ खड़े रहे। अमांपुर के नगला कटीला में राष्ट्रीय कवि बलवीर सिंह रंग ने जन्म लिया और देशभर को मुहब्बत का पैगाम दिया।
उनकी सद्भाव के लिए यह रचना काफी प्रासंगिक है कि मैंने तो गुलशन की खैर मांगी है। वहीं एक अन्य रचना मैं कवि रंग कहते हैं कि मानवता की शपथ मनुज को कृंदनहीन करो। लेकिन 26 जनवरी को तिरंगा यात्रा के विवाद में सौहार्द की मिसाल शहर की फिजा को पलीता लग गया।