फतेहाबाद तहसील के ग्राम तिबाहा में .6915 हेक्टेयर और स्वारा .3640 हेक्टेयर जमीन 820000 में खरीदी गई। इसके तुरंत बाद 13 अक्तूबर 2013 को जमीन अधिग्रहण की अधिसूचना जारी कर दी गई। जुलाई 2014 में जमीन का अधिग्रहण हुआ तो 2865000 मुआवजा मिला। इस तरह 2045000 का लाभ
हुआ। विजिलेंस ने दोनों बैनामों का अध्ययन किया है। विजिलेंस सूत्रों का कहना है कि बैनामों के गवाहों के भी बयान दर्ज किए जाएंगे।
गाजियाबाद की खालिदा ने खरीदी फतेहाबाद में जमीन
जुहैर बिन सगीर ने पद का दुरुपयोग कर अपनी जिस मौसेरी बहन खालिदा रहमान को 20 लाख की कमाई कराई, वह गाजियाबाद के लोनी के किरोड़ी गांव की रहने वाली हैं। जुहैर ने अपनी बहन वरदा सगीर को मुरादाबाद में जमीन खरीदवाई थी। वह दिल्ली की हैं। जुहैर बिन सगीर भी दिल्ली के ही रहने वाले हैं।
आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे के जमीन अधिग्रहण में कई अफसरों ने मलाई खाई। तत्कालीन कई अफसरों ने अपने रिश्तेदारों के नाम पर जमीन लेकर सरकार से चार गुना मुआवजा वसूला। प्रदेश में सत्ता परिवर्तन के बाद हुई जांच में इसका स्पष्ट रूप से तो कोई खुलासा नहीं हो सका था मगर, विजिलेंस की जांच में इसकी पर्ते खुलकर सामने आ रही हैं। तत्कालीन जिलाधिकारी जुहैर बिन सगीर सहित कई अफसरों की कलई खुल सकती है।
302 किमी लंबा आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के ड्रीम प्रोजेक्ट में से एक है। 23 नवंबर 2014 को इसका शिलान्यास हुआ। महज दो साल में बनकर तैयार हुए इस एक्सप्रेसवे के लिए जिले के 32 गांवों में जमीन अधिग्रहण हुआ। एक्सप्रेसवे का एलायनमेंट तय होते ही कई अफसरों ने योजना के लिए अधिग्रहित होने वाली जमीन किसानों से औने-पौने दामों में खरीदना शुरू कर दिया।
जिले में यह एक्सप्रेसवे सदर और फतेहाबाद तहसील अंतर्गत गुजरता है। तब के कई अफसरों ने दोनों तहसील अंतर्गत जमीनें खरीदीं। फतेहाबाद तहसील अंतर्गत 276.0208 हेक्टेयर जमीन का अधिग्रहण किया गया। इसलिए यहां की जमीन पर अफसरों की ज्यादा नजर थी। तत्कालीन डीएम सगीर सहित कई अफसरों ने अपने रिश्तेदारों के नाम पर अधिग्रहण से पहले किसानों से जमीन खरीद लीं। सदर तहसील अंतर्गत 95.7431 हेक्टेयर जमीन का अधिग्रहण हुआ।
एक्सप्रेसवे के शिलान्यास से एक साल पहले हुए बैनामा निकलवाए गए, जिससे यह पता चल सके कि अधिकारी या उसके रिश्तेदार के नाम पर किसानों से जमीन ली गई और बाद में वही जमीन सरकार को चार गुने मुआवजे पर दी गई।
फतेहाबाद और सदर तहसील अंतर्गत हुए बैनामों की जांच शासन को भेज दी गई। इसमें कोई बड़ी गड़बड़ी नहीं मिली थी। क्योंकि अफसरों ने इससे पहले ही खेल कर दिया था। योजना की जानकारी होते ही शिलान्यास से एक साल पहले उन्होंने किसानों से जमीन खरीदी ली थी। इसलिए इनके नाम उजागर नहीं हो सके।
मगर, तत्कालीन डीएम सगीर के खिलाफ हुई एफआईआर के बाद अब कई और तत्कालीन अफसरों की कलई खुल सकती है।