धर्मनगरी मथुरा में वैसे तो कई ऐसे स्थल हैं, जहां कान्हा की अनेको अनेक लीलाओं की कहानी है। ऐसा ही कुछ नंदीश्वर पहाड़ी का भी किताबों में उल्लेख है। यहां देखें इस पहाड़ी पर नंदगांव से यतेंद्र तिवारी की स्पेशल रिपोर्ट...
नंदबाबा का मंदिर जिस नंदीश्वर पहाड़ी पर बसा है उसे भोलेनाथ की पहाड़ी माना जाता है। यहां नंदबाबा के पिता परजन्यजी ने तपस्या भी की थी। इसके बाद उनके चार पुत्रों के बाद नंदबाबा हुए। इस पहाड़ी को कान्हा के लिए सुरक्षित जान श्रीकृष्ण के पालक पिता नंदबाबा ने अपने नाम से नंदगांव बसाया।
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मान मंदिर सेवा संस्थान की ओर से प्रकाशित पुस्तक रसीली ब्रज यात्रा में भी इसका उल्लेख है। इसमें बताया गय है कि देवमीढ की दो रानियां थीं। एक क्षत्राणि जिनसे शूरसेन हुए जो कि वासुदेव जी के पिता थे। दूसरी वैश्य कन्या जिनसे परजन्य जी हुए। यही नंदबाबा के पिता थे।
परजन्य जी ने नारद जी के कहने पर नंदीश्वर पर्वत पर तप किया था। इसके बाद केसी नामक राक्षस के भय से परजन्यजी पुरानी गोकुल महावन में जा बसे। यहां देवी वरीयसि से नंदबाबा समेत अन्य भाई हुए। नंदबाबा मंदिर के सेवायत और एडवोकेट गिर्राज गोस्वामी बताते हैं कि कंस के कारण नंदबाबा कान्हा को लेकर परेशान थे।
उन्होंने अपने कुलगुरु और राधारानी के पिता वृषभानु जी के परामर्श से वे महावन यानि पुरानी गोकुल छोडकर नंदीश्वर पहाड़ी पर भवन बनाकर परिकर समेत रहने लगे। यह स्थान कंस के राक्षसों के लिए श्रापित था। पहाड़ी पर श्राप था कि कंस का कोई भी राक्षस इसकी सीमा में प्रवेश करेगा तो वह पाषाण का बन जाएगा। स्थान को सुरक्षित जान नंदबाबा यहां आकर रहने लगे।
सेवायत कृष्ण मुरारी गोस्वामी बताते हैं कि जनश्रुति के अनुसार, यहां भगवान श्री कृष्ण अपने बडे भाई बलराम के साथ 9 वर्ष 49 दिन तक रहे। श्रीकृष्ण ने यहीं से गोचारण लीला, गोवर्धन पर्वत उठाने की लीला, होली लीला आदि ब्रज लीलाएं की हैं। मान्यता है कि जिस स्थान पर नंदबाबा का मंदिर बना हुआ है उस स्थान पर सैंकड़ी वर्ष पूर्व हींस के वृक्ष थे। एक गाय यहां आकर स्वतः ही अपना दूध निकाल देती थी।
गोस्वामी वंश के प्रवर्तक आनंदघन बाबा के पूर्वज देवकरणजी ने इस स्थान की खोज की। चैतन्य महाप्रभु ने भी चैतन्य चरित्रामृत पुस्तक में गुफा में चार विग्रहों का उल्लेख किया है। जिनमें नंदबाबा, यशोदा मैया, कृष्ण और बलराम जी हैं।