नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) के सख्त रुख के बाद यमुना किनारे हुए तमाम अवैध निर्माणों के जिम्मेदार विभाग एक-दूसरे पर निशाना साधने लगे हैं। उनकी कारगुजारी की परतें अब खुलने लगी हैं। सिंचाई विभाग का कहना है कि यमुना किनारे सिर्फ 11 प्रोजेक्टों को एनओसी दी गई। जबकि डूब क्षेत्र में अवैध निर्माण इससे कहीं अधिक हैं। ऐसे में एडीए पर नदी किनारे तमाम अवैध निर्माणों पर कार्रवाई न करने को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं।
पिछले दिनों चले ध्वस्तीकरण अभियान के दौरान एडीए डूब क्षेत्र के तमाम अवैध निर्माणों को यह कहते हुए बचाता रहा कि इनके पास सिंचाई विभाग की एनओसी है। मगर, उसका यह बहाना अब नहीं चल सकेगा। क्योंकि सिंचाई विभाग का कहना है कि विभाग ने सिर्फ 11 प्रोजेक्ट को एनओसी दी है। विभाग की तरफ से निर्माण की एनओसी नहीं, बल्कि उक्त भूखंड की यमुना से कितनी ऊंचाई है, यहां यमुना का स्तर क्या है और फ्लड लेवल क्या है आदि बिंदुओं पर आख्या दी गई थी। इधर, एडीए सिंचाई विभाग के कागजों के आधार पर बिना भौतिक निरीक्षण किए ही डूब क्षेत्र में नक्शे पास करता रहा। अब एनजीटी में जवाब तलब हुआ है तो दोनों विभाग एक-दूसरे पर निशाना साध रहे हैं।
इनसेट
सिंचाई विभाग ने इनको जारी की एनओसी
. टीआर एस्टेट (वर्तमान में तनिष्क राजश्री एस्टेट)
. मंगलम शिला
. पुष्पांजलि हाइट्स
. कल्याणी अपार्टमेंट
. पुष्पांजलि हाइट्स एक्सटेंशन
. गणपति अपार्टमेंट
. मंगलम एस्टेट एक्सटेंशन
. इंद्रा मिल कंपाउंड
. आस्था सिटी सेंटर
. गोकेश, जगनपुर
. राममोहन विहार
इनसेट
अपने ही जाल में फंसेगा सिंचाई विभाग
अपने वरिष्ठ अधिकारियों के सामने सिंचाई विभाग वर्ष 1953 के बाद से डूब क्षेत्र का निर्धारण न होने के कितने ही तर्क रख दे, लेकिन एनजीटी में यह जवाब मुश्किलें खड़ी कर सकता है। क्योंकि यमुना को मूलस्वरूप में लाने के लिए जो याचिका दाखिल की गई है, उसमें उन जगहों का हवाला दिया है जहां 1978 और वर्ष 2010 में बाढ़ का प्रभाव रह चुका है। इन्हीं जगहों पर अधिकांश इमारतें खड़ी हुई हैं।
साफ क्यों नहीं लिखा, ‘निर्माण नहीं हो सकता’
डूब क्षेत्र में अवैध निर्माणों के लिए सिंचाई विभाग भी कम जिम्मेदार नहीं है। उसकी तरफ से जो एनओसी जारी की गईं, उसमें अपना बचाव करते हुए शब्दों की कारीगरी तो गई लेकिन साफ नहीं लिखा कि उक्त स्थानों पर निर्माण नहीं हो सकता। एडीए भी इसी तर्क को अपने बचाव का आधार बना रहा है।
वर्जन
विभाग की तरफ से निर्माण की एनओसी नहीं दी गई। सिर्फ उक्त भूखंड के बारे में विभाग की तरफ से जानकारी उपलब्ध कराई गई थी।
- शरद कुमार सिंह, एक्जूक्टिव इंजीनियर, सिंचाई विभाग