मैनपुरी। नियमों को ताक पर रखकर जिले में साफ पानी बेचने का कारोबार धड़ल्ले से हो रहा है। प्लांट संचालक न तो मानकों को पूरा कर रहे हैं और न ही उन्होंने लाइसेंस लिया है। मैनपुरी में सिर्फ एक संचालक के पास ही पानी की बिक्री का लाइसेंस है।
जिले भर में 200 छोटे-बड़े पानी प्लांट संचालित हो रहे हैं। नियम है कि पानी के कारोबार के लिए ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड (बीआईएस) प्रमाणपत्र लेना पड़ता है। इसके आवेदन की फीस डेढ़ लाख रुपये है। ऐसे में इतनी बड़ी धनराशि देने से बचने के लिए दुकानदार बीआईएस प्रमाण पत्र नहीं लेते हैं।
इतना ही नहीं प्रमाण पत्र के लिए पानी की जांच भी की जाती है। अगर नमूना जांच में फेल हुआ तो भी प्रमाण पत्र जारी नहीं किया जाता है। जिले में तो केवल एक संचालक के अलावा अब तक किसी दूसरे ने बीआईएस प्रमाण पत्र लिया ही नहीं है। जबकि धड़ल्ले से पानी का कारोबार किया जा रहा है।
कहीं बोतल पैक की जा रही है तो कहीं पाउच पैक किए जा रहे हैं। हाल ही में खाद्य सुरक्षा औषधि प्रशासन ने दो प्लांट को छापा मारकर सील कर दिया था। साथ ही यहां पैक्ड मिले पानी के हजारों पाउच नष्ट करा दिए थे। इसके बाद भी प्लांट संचालकों पर कोई असर नहीं है। वे बेखौफ होकर इस कारोबार को कर रहे हैं।
पानी के कारोबार के लिए बीआईएस प्रमाणपत्र के अलावा खाद्य विभाग से भी लाइसेंस लेना होता है। इसके लिए 12 लाख रुपये तक के कारोबार पर 100 रुपये, इससे अधिक के कारोबार पर दो हजार रुपये और निर्माता को तीन हजार रुपये फीस जमा करनी होती है। लेकिन पानी का कारोबार करने वाले व्यापारियों से भी लाइसेंस नहीं लिया है।
पानी प्लांटों पर केवल नियमों का उल्लंघन ही नहीं, बल्कि पानी की भी बरबादी हो रही है। यहां आरओ से निकलने वाले अशुद्ध पानी को नालियों में बहाया जा रहा है। जानकार बताते हैं कि एक लीटर पानी के लिए तीन लीटर पानी बरबाद किया जा रहा है। इससे भूगर्भ जल स्तर भी प्रभावित हो रहा है।
समय-समय पर पानी के प्लांटों पर अभियान चलाया जाता है। हाल ही में दो प्लांट सील कराए जा चुके हैं। आगे भी कार्रवाई की जाएगी। - रामसुंदर प्रसाद, मुख्य खाद्य सुरक्षा अधिकारी।