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स्वतंत्रता संग्राम - अंग्रेजों भारत छोड़ों आंदोलन में 14 अगस्त 1942 को कासगंज में हुई थी जबरदस्त क्रांति

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कासगंज। स्वतंत्रता आंदोलन में कासगंज क्षेत्र भी आंदोलन का केंद्र रहा। यहां के क्रांतिकारियों ने शासकों के कई बार छक्के छुड़ाए। अंग्रेजों भारत छोड़ा आंदोलन के दौरान 14 अगस्त 1942 को ब्रिटिश शासन के विरोध में कासगंज शहर और इसके आसपास के कस्बों में जबरदस्त प्रदर्शन हुआ था। इसमें हजारों की संख्या में युवा, महिलाएं, बच्चे सब इस क्रांति में शामिल हुए।
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गांधी जी के आह्वान पर अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन शुरू हुआ। इस घोषणा के बाद ही लोग सामूहिक रूप से ब्रिटिश शासन के विरोध पर आमादा हो गए। ब्रिटिश शासकों ने भी तमाम क्रांतिकारियों को आंदोलन से पहले ही गिरफ्तार कर लिया। कांग्रेस नेताओं की गिरफ्तारियां हुईं, लेकिन इसका असर क्रांतिकारियों के बीच नहीं हुआ। अंग्रेजों की दमनकारी नीति से क्रांतिकारी आम जनमानस के साथ एकजुट होते चले गए।
14 अगस्त 1942 को शहर में जबरदस्त क्रांति हुई। यह क्रांति इतनी जबरदस्त थी कि क्रांतिकारियों को रोकने का साहस ब्रिटिश शासक नहीं कर सके। नगर के बाजारों से लेकर सभी सरकारी दफ्तरों और सेवाओं पर क्रांतिकारियों ने कब्जा जमा लिया। टेलीफोन लाइन के तार काट दिए। यहां की रेललाइनों पर कब्जा जमा लिया।
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कासगंज से भड़की क्रांति की ज्वाला आसपास के इलाकों में भी फैल गई। उस समय स्वतंत्रता सेनानी एवं प्रमुख कांग्रेसी नेताओं में बाबूराम वर्मा, मानपाल गुप्ता, बेनीराम केला, बाबूराम साबूनी को गिरफ्तार किया गया। ऐसे में अन्य नेताओं ने भूमिगत रहकर इस आंदोलन का संचालन किया।
अंग्रेज अफसर क्रांतिकारियों की ज्वाला का सामना नहीं कर सके
स्वतंत्रता आंदोलन के जानकार मुनेंद्र सिंह राजपूत ने बताया कि कासगंज आजादी के संघर्ष का प्रमुख केंद्र रहा है। हजारों की संख्या में यहां क्रांतिकारियों ने स्वतंत्रता के आंदोलन में बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया, महिलाएं भी पीछे नहीं रहीं। वे बताते हैं कि पंडित नेहरू और गांधी जी यहां के आंदोलन को लेकर उत्साहित रहते थे और वे यहां आए भी थे। 14 अगस्त 1942 को जब शहर में क्रांति भड़की तो अंग्रेजी अफसर क्रांतिकारियों का सामना नहीं कर पाए।
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