घर में बढ़ता शोरगुल भी लोगों के कानों को बीमार कर रहा है। मिक्सी, कूलर, टीवी-मोबाइल की तेज आवाज से कानों में झनझनाहट, खुजली हो रही है। चिड़चिड़ापन भी देखने मिल रहा है। इससे बच्चे और महिलाएं ज्यादा प्रभावित हो रही हैं। फतेहाबाद रोड स्थित सिजीकॉन-2026 में डॉक्टरों ने व्याख्यान में इसकी जानकारी दी।
प्रयागराज के डॉ. लक्ष्मीशंकर ओझा ने बताया कि घर में औसतन 50 डेसिबल से कम आवाज रहनी चाहिए। अब टीवी, मोबाइल, कूलर, मिक्सी-ग्राइंडर समेत अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की आवाज से 60-80 डेसिबल तक आवाज रह रही है। अगर घर सड़क किनारे है तो ये परेशानी और बढ़ जाती है। इससे लंबे समय तक कानों का गुम रहना, झनझनाहट, दोहरी आवाज आना, झनझनाहट, सांय-सांय की आवाज की परेशानी होने लगती है। तेज बोलने, चिड़चिड़ेपन, नींद कम आने की भी दिक्कत बन रही है।
सैफई मेडिकल कॉलेज के डॉ. संजीव यादव ने बताया कि बच्चे और युवाओं में तेज आवाज में संगीत सुनना, ईयरबड्स-हेडफोन लगाने का चलन बढ़ा है। इससे कान की सुनने वाली कोशिकाएं प्रभावित होती हैं। इनको नुकसान पहुंचने से ये परेशानी बन रही हैं। राजस्थान यूनिवर्सिटी हेल्थ एंड मेडिकल साइंसेज के प्राचार्य डॉ. मोहनीश ग्रोवर ने बताया कि 1000 में से 3-5 बच्चे जन्मजात मूक-बधिर पैदा हो रहे हैं। इनके लिए कॉक्लियर इम्प्लांट वरदान साबित हो रहा है। ये महंगी सर्जरी है, ऐसे में राज्य और केंद्र सरकार की योजना के तहत ये निशुल्क हो रहे हैं।
आयोजन अध्यक्ष डॉ. राजीव पचौरी, सचिव मीनाक्षी बढ़ेरा और डॉ. गौरव खंडेलवाल ने बताया कि मूक-बधिर बच्चे होने पर साल भर की उम्र तक सर्जरी बेहद कारगर है। इससे सुनने और बोलने की क्षमता शतप्रतिशत होती है। 3-5 साल तक की उम्र में भी कॉक्लियर इम्प्लांट करा सकते हैं।
इन बातों का रखें ध्यान
सड़क किनारे घर होने पर खिड़कियों पर शीशे लगवाएं।
-मिक्सी-ग्राइंडर चलाते वक्त अन्य इलेक्ट्रिक उपकरण बंद कर दें।
- टीवी-मोबाइल की आवाज सीमित रखें, धीमे बोलें और चिल्लाएं नहीं।
-कानों में परेशानी होने पर ईएनटी रोग विशेषज्ञ का परामर्श जरूर लें।