मैनपुरी। भारत और हिंदी का नाता सदियों पुराना है। आज भी हिंदी लोगों के दिलों में राज करती है। कुछ ऐसे भी लोग हैं, जिन्होंने हिंदी की सेवा में अपना पूरा जीवन लगा दिया। मैनपुरी हिंदी की सेवा करने वाले ऐसे कवियों और साहित्यकारों से भरी पड़ी है। ऐसे ही कुछ हिंदी प्रेमियों ने अमर उजाला के साथ व्हाट्सएप संवाद में हिंदी के बारे में अपने विचार रखे। उनकी बस एक ही ख्वाहिश है कि हिंदी को वह सम्मान मिले, जिसकी वह हकदार है।
मुक्तक सम्राट ने हिंदी के नाम की जिंदगी
शहर के भोजपुरा निवासी मुक्तक सम्राट कहे जाने वाले कवि लाखन सिंह भदौरिया ने अपनी पूरी जिंदगी हिंदी के नाम कर दी। वर्ष 1928 में जन्में कवि लाखन सिंह भदौरिया ने युवावस्था से ही हिंदी की सेवा शुरू कर दी थी। उन्होंने अब तक आधा सैकड़ा कृतियां लिखीं। इसमें माटी और मुक्तक, अपना दीप जलाओ, ज्योति के फूल, आर्यवीरों से आदि प्रमुख कृतियां हैं।
उनके द्वारा रचित मुक्तकों के माध्यम से भी हिंदी को एक खास सम्मान मिला। इसीलिए उन्हें मुक्तक सम्राट के नाम से जाना जाता है। अब उनकी उम्र 92 वर्ष की हो चली है। हिंदी की बात करते ही उनकी आंखों में एक अलग ही चमक देखने को मिलती है। वह कहते हैं कि पूरा जीवन हिंदी की सेवा में लगाया है। अब युवा पीढ़ी को आगे आकर इस मुहिम को थामना होगा। उनका बस एक ही सपना है कि पूरे विश्व में हिंदी का डंका बजे।
शब्दों में पिरोया मैनपुरी का इतिहास
प्राचीन और पौराणिक स्थलों का इतिहास तो पढ़ने को मिल जाता है। छोटे स्थानों और जिलों का इतिहास आज भी अंधेरे में ही है। इसी इतिहास को लोगों तक पहुंचाने के लिए साहित्यकार श्रीकृष्ण मिश्रा एडवोकेट ने पहल की। उन्होंने हिंदी की सेवा करते हुए पूरा जीवन लगा दिया। अब तक उनके द्वारा दो दर्जन से अधिक कृतियां लिख चुके हैं।
इसमें प्रमुख रूप से मैनपुरी के इतिहास, ईशन नदी, नौनेर और अंग्रेजी हुकूमत पर लिखी गई कृतियां शामिल हैं। आज भी वे निरंतर अपनी लेखनी के माध्यम से हिंदी की सेवा कर रहे हैं। वे कहते हैं कि आज हिंदी के प्रति लोगों में वह लगाव नहीं रहा है। हमें प्रयास करना होगा कि युवा पीढ़ी में हिंदी के प्रति भावनाएं बदलें और वे इसकी ओर आकर्षित हो।