मैनपुरी। हिंदी और हिंदुस्तान का रिश्ता इतिहास से चला आ रहा है। जब भी हिंदी की दशा और दिशा की चर्चा होती है तो साहित्यकार व हिंदी प्रेमियों की पीड़ा उभरकर सामने आती है। हर कोई हिंदी के उत्थान के लिए सरकार से एक ठोस कदम की उम्मीद लगाए हुए है। हिंदी प्रेमियों के अनुसार आज हिंदी केवल आम बोलचाल की भाषा बनकर रह गई है।
जबकि इस भाषा का विस्तार और प्रचलन विश्व के अन्य देशों तक है। अमर उजाला के व्हाट्सएप पर हुए संवाद में हिंदी प्रेमियों ने कहा कि हमारे देश में लोग हिंदी की बजाए अन्य भाषाओं पर जोर दे रहे हैं। ऐसे में जरूरी है कि राज्य और केंद्र सरकारें मिलकर हिंदी के लिए एक ठोस नीति तैयार करें। इसे न केवल कड़ाई से लागू किया जाए बल्कि पालन भी सुनिश्चित किया जाए।
आजकल अंग्रेजी माध्यम के स्कूल के बच्चे केवल हिंदी को एक विषय के रूप में पढ़ते हैं। उन्हें केवल उसमें पास होना होता है। अनिवार्य किया जाए कि हिंदी में 70 प्रतिशत से अधिक अंक लाना अनिवार्य होगा, इससे हिंदी पर बच्चे ध्यान देंगे।
- डॉ. सरोज यादव, प्रवक्ता हिंदी, जीजीआईसी मैनपुरी
यूपी बोर्ड को अगर छोड़ दें तो इंटरमीडिएट तक के छात्रों की हिंदी आज बहुत ही खराब दशा में है। स्कूलों द्वारा भी इस पर ध्यान नहीं दिया जाता है। सरकार को एक आदेश पारित कर हिंदी के सुधार के लिए नियम बनाना चाहिए।
- सुलक्षणा शर्मा, प्रधानाचार्य राजकीय हाईस्कूल अमेहरा
दरअसल हम आज अपने बच्चों को अंग्रेजी, फ्रेंच, स्पेनिश सिखाना चाहते हैं। जब बात हिंदी की आती है तो हमें लगता है कि वह तो सभी कोई जानता है। हम ये नहीं जानते कि हिंदी का सागर अपार है। इसे बोलचाल से ऊपर उठकर देखा जा सकता है।
- राजेंद्र कुमार, सहायक अध्यापक हिंदी, सनातन धर्म इंटर कॉलेज हसनपुर
आज हिंदी के क्षेत्र में रोजगार की कमी नहीं है। बतौर हिंदी शिक्षक व अन्य कई क्षेत्रों में इसका बड़ा महत्व है। इसके बाद भी लोग इसके प्रति आकर्षित नहीं है। इसके लिए एक विशेष पहल सरकार को करनी चाहिए।
- केके यादव, सहायक अध्यापक हिंदी, जनता इंटर कॉलेज नौनेर
कविताओं और कहानियों की पुस्तकें आज की पीढ़ी के लिए शायद बस एक किताब मात्र हैं। इन्हें उच्च शिक्षा में अनिवार्य रूप से शामिल किया जाना चाहिए। इससे हर छात्र इनके बारे में ज्ञान अर्जित करने के साथ ही हिंदी को समझ सके।
- प्रेमचंद्र शाक्य, साहित्यकार
आज प्रदेश सरकार के आदेश तो हिंदी में जारी किए जा रहे हैं, लेकिन न्यायालय और कर संबंधी विभागों के आदेश अंग्रेजी में ही जारी होते हैं। आखिर जब हिंदी हमारी मातृभाषा है तो ऐसा क्यों किया जा रहा है। इस पर ध्यान देना चाहिए।
- गिरीशचंद्र निराला, कवि