सोरों(कासगंज)। श्राद्ध का पितरों के साथ अटूट संबंध है। पितरों के प्रति सच्ची श्रद्धा ही सही मायने में श्राद्ध है। पितरों को आहार पहुंचाने का माध्यम होने के साथ ही उनकी आत्माशांति का मुख्य माध्यम श्राद्ध है। दिवंगत व्यक्ति के प्रति श्रद्धा से तर्पण, पिंड दान आदि किया जाता है उसे श्राद्ध कहा जाता हैं। इन्हीं सभी मान्यताओं को मानते हुए तीसरे दिन भी श्रद्धालु तर्पण के लिए तीर्थनगरी पहुंचे।
पितृ पक्ष के तीसरे दिन बुधवार को राजस्थान, मध्यप्रदेश सहित प्रदेश के कई इलाकों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु अपने पितरों का श्राद्ध कर्म करने पहुंचे। हरिपदी के घाटों पर पहुंचकर तीर्थपुरोहितों से श्रद्धालुओं ने पिंडदान, जल तर्पण आदि श्राद्ध कर्म कराये।
तीर्थपुरोहितों ने विधिविधानपूर्वक मंत्रोच्चारण कर पूजा संपन्न कराई। श्रद्धालुओं ने गंगास्नान करने व मंदिरों में दर्शन करने के बाद ब्राह्मणों को भोजन कराकर वस्त्र आदि दान किए। सुबह से जल तर्पण का शुरू हुआ सिलसिला दोपहर बाद तक चलता रहा। पुरोहितों ने वराह घाट, लक्ष्मन जी घाट, भागीरथी गंगा मंदिर घाट व लाल घाट पर विशेष श्राद्ध कर्म अनुष्ठान कराए गए।
श्राद्ध के देवता हैं वसु,रूद्र और आदित्य
- श्राद्ध कर्म करते वक्त संकल्प व्यक्त किया जाता है कि मेरे वो पितर जो प्रेतरूप हैं, तिलयुक्त जौ के पिंडों से तृप्त हों। साथ ही सृष्टि में हर वस्तु ब्रह्मा से लेकर तिनके तक चर हो या अचर हो मेरे द्वारा दिये जल से तृप्त हों। वसु, रूद्र और आदित्य श्राद्ध के देवता माने गए हैं। हर व्यक्ति के तीन पूर्वज पिता, दादा और परदादा क्रम से वसु, रूद्र और आदित्य के समान माने जाते हैं। - पं. नरेश बरबारिया
-पितृ पक्ष में पीपल की परिक्रमा अवश्य करें अगर 108 परिक्रमा लगाई जाएं तो पितृदोष अवश्य दूर होगा। किसी मंदिर के परिसर में पीपल अथवा बट का वृक्ष लगाएं और रोज उसमें जल डालें एवं उसकी देखभाल करें जैसे-जैसे वृक्ष फलता- फूलता जाएगा पितृदोष दूर होता जाएगा क्योंकि इन वृक्षों पर ही सारे देवी, देवता व इतर योनियां पितर आदि निवास करते हैं। - पं. आदित्य दुबे।