पर्यावरण की सेहत बिगाड़ रहा प्रदूषण
न कूड़ा जलने से रुक पा रहा और न ही पालीथिन पर लग पाई रोक
एसटीपी नहीं कर रहे काम, यमुना में सीधे जा रहा इंडस्ट्रियल वेस्ट
पर्यटन के मानचित्र पर दुनिया में सितारे की तरह चमकने वाले ताजमहल के शहर की आबोहवा दूषित हो चुकी है। खुली हवा में सांस लेना मुश्किल है वहीं, अधिकांश क्षेत्रों में भूमिगत जलस्तर गिरता जा रहा है। ये हालात एक दिन में नहीं बने। पर्यावरण संरक्षण के जो सुझाव थे, उन पर अमल तो दूर, लागू करने के लिए संसाधन तक नहीं जुटाए गए।
बता दें कि केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के एयर क्वालिटी इनडेक्स (एक्यूआई) के अनुसार, शहर की हवा शरीर में तमाम गंभीर बीमारियां पैदा कर रही है। 30 अप्रैल 2016 को नुनिहाई में आरएसपीएम 550 माइक्रोग्राम प्रतिघन मीटर था, पिछले साल इसी तारीख को 194 था। इस साल 30 अप्रैल को एसपीएम 800 था, पिछले साल यह 483 माइक्रोग्राम प्रतिघन मीटर था। मतलब साफ है, हवा में दूषित कणों की मात्रा बढ़ी है। इसके लिए वाहनों और फैक्ट्रियों से निकलने वाला धुआं मुख्य वजह है। साथ ही खुले में कूड़ा जलाना भी हानिकारक साबित हो रहा है। नगर निगम कूड़ा निस्तारण में नाकाम है। कर्मचारी विभिन्न स्थानों पर कूड़ा डालकर उसमें आग लगा देते हैं।
बता दें कि शहर में प्रतिदिन 800 मीट्रिक टन से अधिक कूड़ा निकलता है। इसके निस्तारण की कोई व्यवस्था नहीं है। जबकि नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने मंगलवार से अपने आदेश में कूड़ा जलाने पर प्रतिबंध लगा दिया है। इस पर अमल नहीं हो पा रहा।
पालीथिन बड़ा खतरा
पर्यावरण के लिए पालीथिन खतरा बनी हुई है। प्रदेश सरकार ने इसको पूरी तरह से प्रतिबंधित कर दिया है। जुर्माने के अलावा सजा का भी प्रावधान है। बावजूद इसके नगर निगम, उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड आदि विभाग इस पर अमल नहीं करा पा रहे हैं।
लगातार गिर रहा भूमिगत जल
जिले के 15 में से 11 ब्लॉक डार्क जोन में आ चुके हैं। जागरूकता के अभाव और लापरवाही की वजह से यमुना भी नाले का रूप लेती जा रही है। सिल्ट इतना है कि पानी के शोधन में जल संस्थान के पसीने छूट रहे हैं। मानक से 70 फीसदी अधिक केमिकलों का प्रयोग करना पड़ रहा है।
हरियाली पर चला दी आरी
विकास के लिए हरियाली पर जमकर आरी चलाई जा रही है। नदी किनारे और वन क्षेत्र में मल्टीस्टोरी बनाने के लिए हजारों पेड़ों की बलि चढ़ाई जा चुकी है। पिछले दिनों ताजमहल और बाबरपुर में साढ़े दस हजार से अधिक पेड़ कटवा दिए गए। इस मामले में भी एनजीटी में सुनवाई चल रही है।