सवाल : भारत से फ्रांस तक आपकी यात्रा कैसी रही?
जवाब : मैं मूलरूप से ठाणे (महाराष्ट्र) के एक छोटे से गांव का रहने वाला हूं। पिताजी का तबादला होने पर करीब दस साल चेन्नई में रहा। विवि की पढ़ाई के लिए वापस मुंबई आया। बीकाॅम करते समय मैंने दो-तीन नाटकों का निर्देशन किया। इसी बीच फ्रांस सरकार से स्काॅलरशिप मिल गई। यह मेरी खुशकिस्मती रही कि फ्रांस जाने से पहले मेरी मुलाकात जानी-मानी फ्रांसीसी नाटककार अरियान मुनिस्किन से हो गई। उन्होंने मुझे अपने थिएटर ग्रुप के साथ फ्रांस में काम करने की दावत दी। तब वह भारत-पाकिस्तान बंटवारे पर एक नाटक तैयार कर रही थीं। मैंने तीन महीने उनके साथ काम किया जिसके बाद उन्होंने मुझे आगे भी साथ काम करने का माैका दिया। यह मेरे लिए एक उपलिब्ध से कम नहीं था। मैंने यहां जो कुछ सीखा उसे अपनी झोली में समेटकर फ्रांस ले गया और वहां जो सीखा कोशिश रहती है कि यहां आकर अपने लोगों के साथ साझा करूं।
सवाल : रंगमंच की पहली प्रेरणा कहां से मिली?
जवाब : बचपन गांव में गुजरा, वहीं से इसकी प्रेरणा मिली। गांव में शनिवार को बाजार लगता था। बहरूपिया आता था। नाच-गाना होता था। माैसिकी का भी माहाैल था तो कहानी सुनाने या कहने का शाैक वहीं से पैदा हुआ। बचपन में मैं शादियों में नाचता था, लोगों को हंसाता था। यही सब मुझे रंगमंच की ओर ले गया।
सवाल : भारतीय शास्त्रीय या लोक परंपराओं का आपकी कला पर कितना प्रभाव है?
जवाब : यह मेरे काम की बुनियाद है। मैं जो भी करता हूं उसमें आपको मेरी विरासत दिखेगी। मैंने प्रकाश करुणाकरण से कथक सीखा। भरतनाट्यम भी सीखा। खास बात यह है कि इसी की बदाैलत मुझे नाटककार अरियान मुनिस्किन और पीटर ब्रुक जैसे उस्तादों के साथ काम करने का माैका मिला। नाटककार गिरीश कर्नाड से भी बहुत कुछ सीखा। जब वह तीन साल नेहरू सेंटर लंदन में थे तो उनके साथ बैठकर नाट्यशास्त्र के बारे अध्ययन किया।
सवाल : फ्रांस के थिएटर परिवेश को आप भारत के रंगमंच से कैसे अलग पाते हैं?
जवाब : अपने यहां गांवों में अभी भी असली रसिक हैं। उन्हें लोक कलाओं, नाटकों, माैसिकी से लगाव है लेकिन मुझे लगता है कि शहरों में ऐसे लोग घटे हैं। फ्रांस में ऐसा नहीं है। व्यावसायिक व आर्ट थियेटर का फर्क वहां भी है लेकिन कला को चाहने वाले ज्यादा हैं। सरकार भी कलाकारों की मदद करती है। सब्सिडी देती है। कलाकारों को काम करने की आजादी है मगर उन्हें यह भी अहसास है कि कला के नाम पर कुछ भी नहीं परोसना है। कला को कला की तरह ही पेश करना है ताकि दर्शक एक रसिक की तरह उसका आनंद लें।
सवाल : भारतीय रंचमंच की वर्तमान स्थिति पर क्या कहेंगे?
जवाब : हमारी जो पीढ़ी थी, वह बहुत खुशनसीब थी। एक वक्त था जब देश में हबीब तनवीर, गिरीश कर्नाड, विजया मेहता समेत कई उस्ताद थे। इन सबने अपनी शैलियों को साथ लेकर आधुनिक भारतीय रंगमंच की बुनियाद मजबूत की लेकिन वर्तमान में इन लोगों के काम को हम अब आगे नहीं बढ़ा पा रहे। पुरानी शैली को ही ढो रहे हैं। आज के रंगमंच में नयापन नहीं है जबकि यूरोप के नाटककार नई चीजें ढूंढ रहे हैं। नए फाॅर्म इजाद कर रहे हैं। उनके पास पूरा समय है थिएटर के लिए। उनके पास पैसे और जुनून की कमी नहीं।
सवाल : इसके पीछे की वजह क्या है?
जवाब : अब हमारे पास हबीब तनवीर और गिरीश कर्नाड जैसे उस्ताद नहीं रहे। भारत में थिएटर कलाकारों के सामने फुल टाइम जाॅब या आजीविका का संकट तो है लेकिन उससे भी ज्यादा नाटककारों और कलाकारों को अपनी सोच बदलने की जरूरत है। आज लोग 24 घंटे मोबाइल पर बेवजह की चीजें देख रहे हैं जबकि आप इसके जरिये यह देख सकते हैं कि जापान में कबूकी कैसे हो रहा है। यूरोप में अरियान मुनिस्किन क्या कर रही हैं। लंदन में थिएटर कैसे हो रहा है। हबीब तनवीर साहब और दूसरे नाटककारों के साथ ऐसा नहीं था। तब इंटरनेट न होने पर भी उन लोगों को यह पता था कि लंदन में क्या हो रहा है। यूरोप में कैसा काम हो रहा है क्योंकि वह लोग पढ़ रहे थे। उन्होंने सभी क्लासिक्स जैसे शेक्सपियर और भास को पढ़ा था। आज आप भारत में भास के बारे में पूछिए तो दस प्रतिशत भी लोग उन्हें नहीं जानते होंगे। कितने लोग आज छाऊ और कथकली सीख रहे हैं। यह हमें अपने आप से पूछना होगा। हम अपना नाट्यशास्त्र ही पढ़ लें तो वही काफी है। सरकार को चाहिए कि वह कलाकारों की मदद करें और कला को आगे ले जाने में सहायक बनें।
सवाल : कोई ऐसा नाटक जो आप लिखना या निर्देशित करना चाहते हों?
जवाब : फिरदाैसी के महाकाव्य शाहनामा को मैं मंचित करना चाहता हूं क्योंकि यह एक बेहतरीन किताब है। उसमें जीवन का हर पहलू है। शेक्सपियर के नाटक किंग लियर को भी करने की इच्छा है।
सवाल : आगरा आकर कैसा महसूस करते हैं?
जवाब : आगरा मेरे लिए किसी तीर्थ से कम नहीं। यहां आकर ऐसा लगता है मैं अपनी जड़ों में लौट आया हूं। यहां कई दोस्त हैं, जिनके साथ समय बिताना अच्छा लगता है।