प्रताप सिंह ने बताया कि वर्ष 1964 में वह सेना में भर्ती हुए थे। ट्रेनिंग पूरी होते ही भारत-पाकिस्तान के बीच 1965 में जंग छिड़ गई। इसमें हिस्सा लेने के लिए उनकी भी बटालियन पहुंची। हालांकि युद्ध क्षेत्र में पहुंचने से पहले ही सीजफायर हो गया। वर्ष 1971 में जब दोबारा जंग छिड़ी तो उनकी टीम को युद्ध में जाने का मौका मिला।
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1971 की जंग का किस्सा सुनाते हुए प्रताप सिंह ने बताया कि 3 दिसंबर 1971 को उनकी बटालियन कश्मीर में अखनूर के छंब सेक्टर में तैनात थी। शाम साढ़े 6 बजे वह और उनके साथी बंकरों में बैठकर खाना खा रहे थे, तभी सीमा रेखा के सर्च के आदेश मिले। सर्च करते हुए उनकी टीम सीमा रेखा के पास पहुंची तो पाकिस्तानी टैंक भारत की सीमा की तरफ बढ़ते दिखे। इस पर सर्च पार्टी ने रॉकेट लॉन्चर से मनावर तवी के पुल को ही उड़ा दिया। जिससे पाकिस्तानी फौज भारत में प्रवेश नहीं कर सकी। इस बीच प्रताप सिंह की आंखें भी डबडबा गईं। कहा कि कि 3 से 17 दिसंबर तक चले इस युद्ध में उनके कई साथी वीरगति को प्राप्त हो गए थे।