तब बाहर से ही बन जाते थे लाइसेंस
आरटीओ में वर्ष 2000 से 2005 के बीच आरटीओ में बाहर से ही ड्राइविंग लाइसेंस बनवाकर दे दिए जाते थे। इसका खामियाजा आज तक लोगों को भुगतना पड़ रहा है। एआरटीओ (प्रशासन) एके सिंह का कहना है कि इन पांच साल के दौरान बनाए लाइसेंसों की सबसे ज्यादा फर्जी निकलने की शिकायतें आती हैं। कई मामलों में रिकॉर्ड मिलता है मगर फीस जमा नहीं होता है। ऐसे में आवेदक को दोबारा फीस जमा करने को कहा जाता है तो उसका जवाब होता है कि जब फीस नहीं दी थी तो उस वक्त लाइसेंस कैसे निर्गत हो गया।
पुराने लाइसेंस जांच में निकलते हैं फर्जी
आरटीओ (प्रशासन) प्रमोद कुमार सिंह ने बताया कि वर्ष 2000 से 2008 के दौरान निर्गत बहुत से ड्राइविंग लाइसेंस का ब्योरा कार्यालय में नहीं मिलता है। उस दौरान कार्यालय के बाहर से लाइसेंस जारी कर दिए जाते थे, जिनका रिकॉर्ड कार्यालय में नहीं मिल पाता है। ऐसी शिकायतें अकसर आती हैं।