घर के दरवाजे पर खड़ी होकर खाली मकानों को जमींदोज होता देखतीं महिलाएं और बच्चे। माथे पर चिंता की लकीरें और चेहरे पर अपना आशियाना उजड़ जाने की दहशत। कभी किसी पड़ोसी से बचाव का रास्ता पूछतीं तो कभी फैसला भगवान पर छोड़तीं। ये नजारा शुक्रवार को मां गौरी टाउन में था। बिल्डर की करतूत की सजा भुगतने के डर से लोगों में हड़कंप मचा हुआ है।
बता दें कि शहर के भीड़भाड़ से दूर यमुना किनारे खासपुर में महेंद्र सिंघानिया ने अपने साथियों के साथ मिलकर वर्ष 2010 में मां गौरी टाउन विकसित की। निम्न, मध्य वर्गीय लोगों को ध्यान में रखते हुए वहां 60-80 वर्ग गज के मकान बनाए गए। इसमें लगभग 150 भवनों का निर्माण हो चुका है। इसके बाद और भवन बनाए जा रहे थे। वर्तमान में लगभग 65 परिवार वहां बस चुके हैं।
तब बिल्डर ने नहीं दी डूब क्षेत्र की जानकारी
यमुना को मूलस्वरूप में लाने के लिए सुप्रीम कोर्ट अनुश्रवण समिति के सदस्य डीके जोशी की याचिका पर एनजीटी ने डूब क्षेत्र में निर्माणों पर कार्रवाई के आदेश किए। पिछले दिनों जब एडीए की टीम कार्रवाई को पहुंची तब पहली बार लोगाें को अपने आशियाने पर खतरा मंडराता दिखा। उन्होंने एडीए अधिकारियों से कुछ दिनों की मोहलत मांग ली। मगर, एडीए का नोटिस मिलने के बाद कालोनी में हड़कंप मच गया था। लोग कामकाज छोड़कर अपने घर बचाने में जुट गए। लगभग 32 लोग हाईकोर्ट चले गए थे। वहां भी राहत नहीं मिली। फैसला कमिश्नर पर छोड़ दिया। वहां से उनकी अपील खारिज कर दी गई। लोगों का कहना है कि एक-एक पाई जोड़कर जैसे-तैसे मां गौरी टाउन में सिर ढकने के लिए छत का बंदोबस्त किया था। जब बिल्डर से मकान खरीदे तब उन्हें डूब क्षेत्र के बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई थी।