एसएन मेडिकल कॉलेज में 95 स्तन कैंसर पीड़ित महिलाओं पर हुए शोध में सामने आया कि सर्जरी, स्तन हटने, पति के साथ छोड़ने और स्तनपान को लेकर डर ने कई महिलाओं को इलाज टालने पर मजबूर किया। 87 फीसदी महिलाओं ने सेल्फ डिटेक्शन से आशंका होने के बावजूद बीमारी छिपाई, जिसके चलते कई मरीज दूसरी-तीसरी स्टेज में इलाज के लिए पहुंचीं।
आगरा में स्तन में गांठ मिली तो चिंता बढ़ी। कैंसर निकला तो सर्जरी होगी। बाल झड़ जाएंगे। स्तन हटाना पड़ा तो कैसी दिखूंगी। कहीं पति साथ न छोड़ दे। बच्चों को स्तनपान कैसे कराऊंगी। ऐसी ही आशंकाओं और भ्रांतियों ने महिलाओं के कदम इलाज की ओर बढ़ने से रोक दिए। नतीजा, मर्ज दूसरी-तीसरी स्टेज तक पहुंच गया। एसएन मेडिकल कॉलेज में 95 महिलाओं पर हुए शोध में इलाज में देरी के पीछे ऐसे ही डर और सामाजिक कारण सामने आए हैं।
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एसपीएम विभाग की स्तन कैंसर से पीड़ित 20 से 50 साल की 95 महिलाओं पर 2024-26 तक शोध किया गया। इसमें 26 फीसदी कामकाजी और 74 प्रतिशत घरेलू महिलाएं रहीं। इसमें 3 फीसदी अशिक्षित, 58 फीसदी इंटर पास और 39 फीसदी उच्च शिक्षित रहीं। 87 फीसदी महिलाओं ने सेल्फ डिटेक्ट से स्तन कैंसर की आशंका होने पर भी बीमारी को छिपाती रहीं।
चिकित्सकों को शोध के दौरान महिलाओं ने बताया कि उन्हें इस बात का डर था कि सर्जरी हुई तो स्तन बिना कैसे लगूंगी। पति हीनभावना रख सकते हैं। साथ छोड़ दिया तो मायके वालों पर बोझ बन जाऊंगी। बच्चे हुए भी तो कैसे पालूंगी (स्तनपान कराऊंगी)। लोग क्या सोचेंगे। इन्हीं ऊहापोह में समय बीतता गया लेकिन उनकी ये सोच गलत साबित हुई। बीमारी पर पति-परिजन ने साथ दिया और इलाज भी कराया।
जांच, इलाज और आर्थिक तंगी भी देरी की वजह
एसपीएम विभाग की डॉ. रेनू अग्रवाल ने बताया कि शोध में पाया कि 95 में से 13 फीसदी महिलाओं के स्तन कैंसर के इलाज में विशेषज्ञों की कमी, संसाधनों की कमी और आर्थिक तंगी समेत अन्य वजह शामिल रहीं। ऐसे में कैंसर मरीजों के लिए संस्थानों में विशेष व्यवस्था बनाने की जरूरत है। इसमें सामाजिक संगठनों को भी आगे आना चाहिए।
उच्च शिक्षितों में भी भ्रांतियां
एसपीएम विभाग शोधार्थी डॉ. प्रतिभा सिंह का कहना है कि स्तन कैंसर के प्रति अधिकांश महिलाएं जागरूक हैं। सेल्फ डिटेक्ट कैसे करें, इसके बारे में भी पता है। चौंकाने वाली बात रही कि उच्च शिक्षित महिलाओं ने भी भ्रांतियों और आशंकाओं के चलते इलाज में देरी की।
आशंका से देर से इलाज
एसएन मेडिकल कॉलेज के कैंसर रोग विभाग की डॉ. सुरभि गुप्ता ने बताया कि ओपीडी में कुल मरीजों में 24 फीसदी स्तन कैंसर के हैं। अभी 153 मरीजों का इलाज चल रहा है। इसमें अधिकांश मरीज दूसरी-तीसरी स्टेज पर आ रहे हैं। पूछताछ में मरीज बताती हैं कि गांठ में दर्द नहीं था, पति-समाज क्या सोचेगा, जबकि समय पर इलाज से मर्ज ठीक हो रहा है।
ये लक्षण तो डॉक्टर को दिखाने में न करें देरी:
स्तन में गांठ होना, जिसमें दर्द न हो।
स्तन की त्वचा में संतरे के छिलके की तरह गड्ढे पड़ना।
निप्पल से रक्तस्राव होना, कांख में गांठ होना।
स्तन की त्वचा का लाल होना, निपल का अंदर धंसना।
इस उम्र की रहीं महिलाएं:
साल प्रतिशत
20 से कम 05
21-30 23
51 से अधिक 19
95: मरीजों पर किया गया शोध
87: फीसदी को थी बीमारी की आशंका
26: फीसदी कामकाजी महिलाएं
74: फीसदी घरेलू महिलाएं
13: फीसदी का धन की कमी से देरी से शुरू हुआ इलाज