आगरा अपर आयुक्त कोर्ट से जुड़े मैनपुरी के कम से कम चार मामलों में पीठासीन अधिकारी की मंजूरी के बिना आदेश जारी होने का मामला सामने आया है। आरोप है कि कर्मचारियों ने डिजिटल हस्ताक्षर/आईडी का गलत इस्तेमाल कर आदेश पोर्टल पर अपलोड किए, जिसकी विभागीय जांच अब तक पूरी नहीं हुई है।
मैनपुरी के घिरोर निवासी रामेश्वर दयाल ने अपनी जमीन के सीमांकन विवाद में उप-जिलाधिकारी कोर्ट के फैसले के खिलाफ आयुक्त कोर्ट में अपील दाखिल की थी। मामले में साक्ष्य और बहस की तिथि नियत थी लेकिन उससे पहले ही पोर्टल पर रामेश्वर की अपील खारिज करने का अंतिम आदेश अपलोड कर दिया गया।
केस दो:
मैनपुरी के भोगांव तहसील के कुरावली गांव निवासी वादी सत्यप्रकाश का गाटा संख्या 142 की कृषि भूमि पर स्थगन आदेश (स्टे) पाने के लिए आयुक्त कोर्ट में वाद चल रहा था। सुनवाई के दौरान पीठासीन अधिकारी ने पत्रावली आदेश के लिए सुरक्षित (रिजर्व) रखी थी। हालांकि, आधिकारिक पीठ द्वारा कोई निर्णय सुनाए जाने से पूर्व ही विपक्षी रामपाल के पक्ष में बेदखली की कार्रवाई रोकने संबंधी अंतरिम आदेश जारी हो गया।
यह दो मामले उदाहरण भर हैं यह बताने के लिए कि आयुक्त कार्यालय की अदालतों में न्यायिक गरिमा से किस तरह खिलवाड़ हो रहा है। मुकदमों से जुड़े वादी-प्रतिवादी न्याय पाने की उम्मीद में वर्षों तक चक्कर काटते हैं लेकिन पीठ की मंजूरी के बिना ही फैसलों का सौदा पर्दे के पीछे हो रहा है।
अमर उजाला को मिले दस्तावेज से पता चला है कि मैनपुरी से जुड़े कम से कम चार मामलों में पीठासीन अधिकारी की मंजूरी के बिना ही प्रकरणों में आदेश जारी हो गए। इन सभी मामलों में प्रधान सहायक/रीडर, न्यायालय अपर आयुक्त रहे राजेंद्र कुमार और दो कर्मचारियों राम कुमार एवं शैलेंद्र की भूमिका सवालों के घेरे में आ गई है। कुछ मामलों में पीठासीन अधिकारी के छुट्टी पर होने का लाभ उठाकर रीडर ने कोर्ट के कर्मचारी के साथ मिलकर विपक्षी पक्षकार से सांठगांठ की।
फर्जी पत्रावली तैयार की और डिजिटल हस्ताक्षर/आईडी का गलत इस्तेमाल कर अवैध आदेश पारित कर फर्जी फैसला पोर्टल पर चढ़ा दिया। आदेश जारी होने में धांधली का पता चलने पर आला अधिकारियों ने आरोपी रीडर व अन्य कर्मचारियों की सिर्फ सीट ही बदली है।
जिम्मेदार खेल रहे जांच-जांच
बड़े पैमाने पर आदेश जारी करने में धांधली के गोरखधंधे का पता चलने के बाद भी अफसर जांच-जांच खेल रहे हैं। मार्च में कागजों में आरोपी कर्मियों को नोटिस जारी कर आरोप पत्र (चार्जशीट) दिया गया। सभी प्रकरणों में पेश होने वाले एक ही अधिवक्ता से बयान लिए गए। हालांकि विभागीय जांच पांच महीने बाद भी पूरी नहीं हो सकी है। वहीं, पीड़ित न्याय पाने और उनके साथ हुए अन्याय को करने वालों के खिलाफ कार्रवाई के लिए अफसरों से लेकर पुलिस के चक्कर काट रहे हैं।
आगरा मंडल मंडलायुक्त नगेंद्र प्रताप ने बताया कि कोर्ट के आदेश जारी करने में गड़बड़ी की शिकायतें मिलीं थीं। इनकी विभागीय जांच कराई जा रही है। जांच में कुछ कमियां मिली हैं, इसलिए अनुपूरक जांच कराई जा रही है। रिपोर्ट आने के बाद जो भी कर्मचारी दोषी पाया जाएगा, उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी।