देवेश शाक्य और राजवीर सिंह उर्फ राजू भैया
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एटा लोकसभा सीट पर 10 साल के कार्यकाल का मिथक भाजपा के राजवीर सिंह पर भी भारी पड़ा। आखिर उन्हें भी पूर्व के सांसदों की तरह अपनी कुर्सी गंवानी पड़ गई। एटा लोकसभा क्षेत्र के मतदाताओं ने परंपरा के रूप में चल रहे मिथक को इस बार भी कायम रखा।
शुरूआती दौर से देखा जाए तो कांग्रेस के वर्चस्व के दरम्यान ही इस परंपरा ने रूप लेना शुरू किया था। 1951-52 के बाद 1957 का चुनाव तो कांग्रेस ने जीता। इस तरह 10 साल का कार्यकाल रोहनलाल चतुर्वेदी ने सांसद के रूप में पूरा किया। लेकिन 1962 में जब तीसरा लोकसभा चुनाव हुआ तो कांग्रेस व रोहनलाल को जनता ने नकार दिया।
हिंदू महासभा के विशन चंद्र सेठ को मौका दिया था। हालांकि अगले चुनाव 1967 में रोहनलाल चतुर्वेदी ने फिर वापसी की। इसके बाद 1971 में भी चुनाव जीतकर सांसद बने। लेकिन 10 साल के कार्यकाल के बाद 1977 के चुनाव में जनता ने कांग्रेस को बदलकर भारतीय लोकदल के महादीपक सिंह शाक्य को संसद पहुंचा दिया।
बाद में महादीपक सिंह शाक्य भले ही 1989 से चार बार सांसद चुने गए, लेकिन 1998 तक उनका कार्यकाल नौ साल का ही रहा। परंपरा की तरह 1999 में बदलाव हुआ। सपा के देवेंद्र सिंह सांसद चुने गए। 2004 में फिर उन्हें जनता ने पसंद किया। लेकिन इसके बाद 10 साल की बाधा उनके रास्ते में भी आ गई। भले ही उन्होंने बसपा से चुनाव लड़ा, लेकिन लोगों ने निर्दलीय कल्याण सिंह को चुनकर देवेंद्र सिंह को 10 साल के बाद संसद जाने से रोक दिया।
लोकसभा चुनाव 2014 में भाजपा के राजवीर सिंह सांसद बने। 2019 में और अधिक वोट पाकर फिर से उन्होंने कुर्सी हासिल की। उन्हें उम्मीद थी कि इस बार जीतकर वह 10 साल वाला यह मिथक तोड़ देंगे। लेकिन ऐसा नहीं हो सका। जनता ने उन्हें लाल झंडी दिखाकर सपा के देवेश शाक्य को आगे बढ़ा दिया।