ताजमहल की मीनारों पर चल रहे ‘मडपैक’ के साथ ही एएसआई इन पर लगी कालिख की जांच शुरू कर रहा है। ताज की चारों मीनारों के छज्जों पर धूल, मिट्टी के कणों की मोटी परत जमा हो चुकी थी। एक से डेढ़ इंच तक मोटी कालिख की परत के सैंपल लेकर इनकी जांच शुरू की गई है। आईआईटी कानपुर के साथ मिलकर एएसआई की केमिकल ब्रांच ताज पर प्रदूषणकारी तत्वों का ब्योरा जुटाएगी।
एएसआई रसायन शाखा के डिप्टी सुपरिटेंडेंट आर्कियोलोजिस्ट (केमिकल) एमके भटनागर की देखरेख में उनकी टीम ने उत्तर पूर्वी और उत्तर पश्चिमी मीनारों के छज्जाें से यह सैंपल लिए हैं। ताजमहल की मीनारों में अलग-अलग ऊंचाई पर मौजूद तीन छज्जों और सबसे ऊपर की बुर्जी पर जमा धूल-मिट्टी के इन सैंपलों में प्रदूषणकारी तत्वों की पहचान की जाएगी कि हर दिशा और निश्चित ऊंचाई पर किस तरह के प्रदूषण का असर ताज पर हो रहा है। आईआईटी कानपुर के विशेषज्ञों के साथ इन सैंपलों की रिपोर्ट तैयार होगी।
मिली थी कार्बन कणों की अधिकता
डेढ़ साल पहले आईआईटी कानपुर, एटलांटा यूनिवर्सिटी के साथ मिलकर एएसआई ने ताज के पीले पड़ने की रिपोर्ट जारी की थी। इसमें ताज पर कार्बन कणों की मौजूदगी बताई गई। उसके बाद ही अप्रैल 2015 में अश्वनी कुमार की अध्यक्षता वाली संयुक्त संसदीय कमेटी ने ताज के पीलेपन की जांच की और अपनी फाइनल रिपोर्ट दी। उसी रिपोर्ट के बाद एएसआई को मडपैक के जरिए उजला करने के लिए बजट और संरक्षण की मंजूरी मिली।
सैंपलों की जांच रिपोर्ट से तय होगी संरक्षण नीति
आगरा। यमुना किनारे मौजूद ताजमहल पर धूल और प्रदूषणकारी तत्व इसके गुंबद पर तो टिक नहीं पाते। मानसून और वेस्टर्न डिस्टरबेंस की बारिश में समय-समय पर इसकी धुलाई होती रही है, लेकिन 140 फुट ऊंची मीनारों के नीचे छज्जों और बुर्जियों पर धूल जमा होती रही। यहीं से सैंपल एकत्रित किए गए हैं। हर दिशा की मीनार का सैंपल जांचने के बाद जो रिपोर्ट आएगी, उससे एएसआई को अपनी संरक्षण नीति बनाने में मदद मिलेगी।