ईयरबड्स-हेडफोन लगाकर तेज आवाज में घंटों तक गाने सुनते हुए काम करना या घूमना-टहलना युवाओं के लिए नुकसानदेह साबित हो रहा है। ऐसी स्थिति से करीब 12 फीसदी युवाओं को कान की बीमारी हो रही है। माइग्रेन के साथ ही उनकी याददाश्त पर भी असर पड़ रहा है। फतेहाबाद रोड स्थित होटल में आयोजित सिजिकॉन-2026 के दाैरान ईएनटी विशेषज्ञों ने अमर उजाला से विशेष बातचीत में चिंता जताते हुए ये बातें कहीं।
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द काॅक्लियर इम्प्लांट ग्रुप ऑफ इंडिया (सीआईजीआई) की अध्यक्ष बंगलूरू की डॉ. माधुरी गोरे ने बताया कि 40-60 डेसिबल आवाज ही कानों के लिए बेहतर है। वाहनों की आवाज, टीवी-मोबाइल, डीजे, निर्माण कार्य समेत अन्य वजहों से घर के बाहर से औसतन 60-80 डेसिबल तक आवाज रहती है। इससे कानों की परेशानी बढ़ रही है।
खासतौर से ईयरबड्स-हेडफोन बच्चों और युवाओं की सुनने की क्षमता पर असर डाल रहे हैं। युवा 90-100 डेसिबल तक आवाज कर लेते हैं। 4-6 घंटे तक लगातार इस्तेमाल के कारण ऊंचा सुनने, सिरदर्द-भारीपन, चक्कर आने, थकावट, दोहरी आवाज सुनाई पड़ने, चिड़चिड़ेपन, नींद कम आने, तेज आवाज में बोलने की परेशानी बन रही है। इनमें 20 साल तक के आठ फीसदी मरीज हैं।
सीआईजीआई की पूर्व अध्यक्ष डॉ. कल्याणी मांडेक ने बताया कि तय मानक से अधिक ध्वनि से कानों की सुनने की कोशिकाएं क्षतिग्रस्त होने लगती हैं। लंबे समय तक ऐसी स्थिति रहने से कान में दर्द रहना, सूजन होना, सीटी की आवाज आने की परेशानी बनती है। बच्चों में ये लत तेजी से पनपने पर उसकी समझने और याद करने की क्षमता भी प्रभावित हो रही है।
इन बातों का रखें ध्यान:
ईयरबड्स से बचें। जरूरी हो तो आवाज 60 डेसिबल से कम रखें।
मोबाइल, टीवी की आवाज कम रखें। लंबे समय तक नहीं देखें।
रोड के पास घर है तो खिड़कियों पर शीशा लगवाएं। दरवाजे बंद रखें।
ईयरबड्स, हेडफोन का 25-30 मिनट उपयोग कर बंद कर दें।
सुबह टहलते, सफर करते समय ईयरबड्स-हेडफोन का प्रयोग न करें।
मूक-बधिर की पहचान के लिए हो नवजात की स्क्रीनिंग
चेन्नई के पद्मश्री डॉ. मोहन कामेश्वरन और मुंबई के पद्मश्री डॉ. मिलिंद कीर्तने ने कहा कि जन्मजात मूक-बधिर बच्चे काॅक्लियर इम्प्लांट से सुन और बोल सकते हैं। ऐसे में नवजात की स्क्रीनिंग अनिवार्य कर दी जाए। इससे मूक-बधिर होने पर साल भर के अंदर ऑपरेशन हो सके। बंगलूरू के डॉ. सुनील दत्त ने बताया कि एक हजार में से 3-5 बच्चों मूक-बधिर होते हैं। साल भर में सर्जरी होने से सुनने-बोलने की क्षमता पूरी तरह से विकसित हो जाती है। वैसे तीन साल तक भी इम्प्लांट करा सकते हैं। कार्यक्रम में आयोजन अध्यक्ष डॉ. राजीव पचौरी, डॉ. गौरव खंडेलवाल, मीनाक्षी बढ़ेरा, डॉ. नीलम वैद्य ने भी व्याख्यान दिए।