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AIMPLB से नदवी की बर्खास्तगी पर मुस्लिम बुद्धिजीवियों ने किए ऐसे कमेंट

Tue, 13 Feb 2018 04:46 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला आगरा
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ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड
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अयोध्या विवाद के हल के लिए बाबरी मस्जिद को स्थानांतरित करने का सुझाव देने वाले मौलाना सैयद सलमान हसन नदवी को मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड से बर्खास्त करने के फैसले पर मुस्लिम एकमत नहीं हैं। 
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कुछ का कहना है कि किसी संस्था के सदस्य की हैसियत से उन्हें ये बयान नहीं देना चाहिए था। वहीं कुछ ने बोर्ड के फैसले का स्वागत किया है।

इस्लामिक पीस एवं डेवलेपमेंट फाउंडेशन के अध्यक्ष हाजी मोहम्मद इकबाल ने कहा कि आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने 45 साल में मुस्लिमों के लिए कोई उल्लेखनीय काम नहीं किया। 

ये नुमाइशी इदारा है। मुसलमानों के निकाह और तलाक के मसलों पर भी कोई काम नहीं कर सका। यही कारण रहा कि मुस्लिम महिलाओं को हक मांगने के लिए कोर्ट तक जाना पड़ा। 

जहां तक नदवी और बोर्ड के बीच के विवाद का मामला है तो इसमें भी दोनों की गलती है। नदवी को कोर्ट में चल रहे केस में बगैर बोर्ड को भरोसे में लिए इस तरह का बयान नहीं देना चाहिए था। वहीं बोर्ड ने भी उन्हें बर्खास्त करके जल्दबाजी की। 

एडवोकेट अमीर अहमद का कहना है कि जब किसी संस्था से जुडे़ होते हैं तो उसके नियम कायदों को मानना पड़ता है। सलमान हसन नदवी का बयान उनकी निजी राय हो सकती है, लेकिन मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड के सदस्य की हैसियत से उन्हें बयान नहीं देना चाहिए था। 

मामला कोर्ट में विचाराधीन है। बोर्ड ने जो फैसला किया है, वह मुनासिब है। बोर्ड ने कोर्ट के फैसले को ही मानने की बात कही है। ऐसे में बोर्ड की राय से अलग बात करना ठीक नहीं था। 
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उचित कदम बताया

नायब काजी मौलाना मोहम्मद उजैर आलम ने कहा कि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने नदवी को दरकिनार कर दिया, क्योंकि वह बोर्ड की राय से इत्तफाक नहीं रखते थे। चूंकि बोर्ड की राय उनसे जुदा थी, इसके कारण बोर्ड ने उन्हें हटाया है, जोकि उचित कदम है। 

इस कदम का समर्थन करता हूं, लेकिन जहां तक बोर्ड में फैसले लेने की बात है तो सभी को सर्वसम्मति से कोई फैसला लेना चाहिए। चंद लोगों के वर्चस्व को खत्म करना भी जरूरी है। 

जमीअत उलमा ए हिंद के जिला प्रवक्ता सगीर अहमद ने बताया कि आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने मुस्लिमों की भावनाओं को आहत करने वाला बयान दिया है। बोर्ड ने उन्हें सदस्य के पद से हटाकर स्वागतयोग्य कदम उठाया है। 

अगर कोई सदस्य बोर्ड की नीतियों से अलग हटकर सार्वजनिक रूप से ऐसा बयान देता है तो उसे बोर्ड में बने रहने का कोई हक नहीं है। बोर्ड एक जिम्मेदार इदारा है और मुस्लिम शरीयत की रोशनी में मुसलमानों की रहनुमाई करता है। 
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