आगरा में मंगलवार की दोपहर में दो बजे थे। सूरज का पारा चढ़ रहा था। जयपुर हाउस रोड पर 55 वर्षीय नानकचंद डगमगाते कदमों से साइकिल थामे पैदल चल रहे थे। साइकिल के पीछे लाल सिलिंडर बंधा था। खाली, लेकिन उम्मीदों से भारी। पिता का संतुलन न बिगड़े, इसलिए उनकी बेटी खुशी लाठी बनकर साथ चल रही थी।
जगदीशपुरा के आजाद नगर निवासी नानकचंद एक स्टेशनरी फैक्टरी में मजदूर हैं। ढलती उम्र और खराब सेहत के कारण 14 किलो का खाली सिलिंडर ढोना उनके लिए किसी पहाड़ चढ़ने जैसा था। ऐसे में बेटी खुशी अपने पिता का बेटा बनकर संबल देने साथ निकल आई थी। धूप में दोनों मयूर गैस एजेंसी पहुंचे। बुकिंग खिड़की पर 100 से अधिक लोगों की कतार थी। नानकचंद ने एक पेड़ की छांव में साइकिल खड़ी की। बेटी सिलिंडर की रखवाली करने लगी और पिता हाथ में मोबाइल लिए नानक कभी नंबर मिलाते, तो कभी लाचार आंखों से बुकिंग खिड़की को देखते। एक घंटे की जद्दोजहद के बाद भी न फोन लगा, न सिलिंडर मिला।
साहब, मेरा शरीर साथ नहीं देता
दोपहर के तीन बज चुके थे। थकान और बीमारी से बेहाल नानक ने जब देखा कि बात नहीं बन रही, तो भारी मन से वापसी की राह पकड़ी। जाते समय नानक बोले, मेरा बेटा छोटा है, इसलिए मेरी बेटी ही मेरा बड़ा बेटा है। रिफिल होने पर सिलिंडर 30 किलो का हो जाता है, बीमार शरीर इतना वजन नहीं उठा पाता, इसलिए बेटी मदद के लिए साथ आ गई।