सोरों (कासगंज)। कांवड़ यात्रा एक कठिन साधना का प्रतीक है। कांवड़ियां जब कांवड़ उठाता है तो उसके अंदर एक अटूट आस्था होती है। मन में तप जैसी साधना के साथ उसका दृढ़ संकल्प चेहरे पर नजर आता है। भागते दौड़ते कांवड़िए साधना के इस कठिन पथ को पूरा करते हैं।
कांवड़ उठाकर निकलने वाली टोलियां मार्ग में बेहद सतर्कता के साथ निकलती हैं कि चलते समय कहीं कोई ऐसा व्यवधान उत्पन्न न हो जाए, जिससे उनकी कांवड़ खंडित हो जाए। इसलिए कांवड़िए हाथ में डंडा लेकर मुंह से सीटी बजाते और पैरों में घुंघरू बांधकर निकलते हैं। जिससे आसपास से निकलने वाले लोग कांवड़ियों के होने का आभास कर सकें।
गंगाघाट से कांवड़ लेने के बाद इसे कहीं भी जमीन पर नहीं रखा जाता। इसके लिए एक कांवड़ पर दो लोग रहते हैं। थकान की स्थिति में कांवड़ दूसरे के कांधे पर दे देते हैं। बुधवार को कांवड़ मेले के दौरान कांवड़ लिए और हाथ में गंगाजली लिए कांवड़िए प्यास से इतने व्याकुल थे कि वे पानी पीना चाहते थे, लेकिन उनके साथी उनसे आगे निकल गए थे। ऐसे में सेवादारों के हाथों से ही पानी पिया। भरतपुर के कांवड़िए आकाश ने बताया कि कांवड़ को कंधों पर ही ले जाकर सीधे महादेव के मंदिर में अभिषेक किया जाता है। आगरा के दिनेश और सोनू ठाकुर ने बताया कि कांवड़ को पूरी पवित्रता के साथ गंतव्य तक ले जाया जाता है।