तो क्या डा. भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय के नाम से मिलने वाली मार्कशीट असली हैं, सिर्फ छात्र और नंबर ही जनरेट किए गए हैं। विश्वविद्यालय की ब्लैंक मार्कशीट बेचने के प्रकरण से तो यही संभावना जताई जा रही है। हाल ही में इंजीनियरिंग और एमबीबीएस की फर्जी मार्कशीट में अधिकारियों के हस्ताक्षरयुक्त मुहर और लोगो वास्तविक प्रतीत हो रहे थे। संभव है शिक्षा माफिया को ब्लैंक मार्कशीट की सप्लाई के तार यहीं से तो नहीं जुड़े।
बीते महीने विश्वविद्यालय के इंस्टीट्यूट आफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी के नाम से बीटेक, एमटेक, बीएससी इन कंप्यूटर साइंस जैसे कोर्स की कई मार्कशीट और एसएन मेडिकल कालेज के नाम से दो एमबीबीएस की मार्कशीट सत्यापन में फर्जी मिली थी। खास बात इस पर लोगो और हस्ताक्षरयुक्त मुहर असली प्रतीत लग रहे थे। जबकि इस पर दर्ज छात्र इन संस्थानों के नहीं मिले। इधर 2014 का रिजल्ट तैयार कर रही शुभाटेक प्राइवेट कंपनी के कर्मचारी पर ब्लैंक मार्कशीट बेचने का आरोप लगा है। इसका कार्यालय (डेटा सेंटर) विश्वविद्यालय के खंदारी कैंपस में स्थित है। आरोप है कि कंपनी का एक कर्मचारी मार्कशीट का बंडल किसी अज्ञात को दे रहा है। विश्वविद्यालय पीआरओ डा. मनोज श्रीवास्तव का कहना है कि एजेंसी संचालक से ब्लैंक मार्कशीट का विवरण मांगा है। दो दिन में उपलब्ध न कराने पर मुकदमा दर्ज कराया जाएगा। बात करने के लिए एजेंसी के सीईओ सुशांत गिरि को फोन लगाया तो बंद मिला।
सीसी कैमरे की फुटेज जब्त
- सूत्र बताते हैं कि मामले की हकीकत जानने के लिए कंपनी के सीईओ सुशांत गिरि ने डेटा सेंटर में लगे सीसी कैमरे की फुटेज जब्त कर लिए हैं। सीलबंद सीडी तैयार कर इसे कुलपति को दिया जाएगा।
फर्जी निकली मार्कशीट, एफआईआर अभी भी नहीं
- फर्जीवाड़े पर डा. भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय की कार्रवाई जांच और एफआईआर के मौखिक आदेश तक ही सिमट गई है। एमबीबीएस और इंजीनियरिंग की सत्यापन में भी मार्कशीट फर्जी की पुष्टि होेने पर भी अभी तक मुकदमा दर्ज नहीं कराया गया है।