जिस मंटोला में बिजली की केबल डालने पर पथराव हो जाता था, उसी अतिसंवेदनशील क्षेत्र की गलियों में जाकर पुलिस-प्रशासन ने मांस की अवैध दुकानें बंद कराईं। हंगामा तो दूर विरोध तक नहीं हुआ। डर की वजह से बहुत से दुकानदार तो सामने ही नहीं पड़े। वह टीम के पहुंचने से पहले ही अपनी दुकानें बंद करके भाग निकले।
ये मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का ही खौफ था कि मंटोला में खुराफाती खामोश रहे। वरना, छोटे-छोटे अभियानों पर राजनीतिक रोटियां सेकने के लिए कुछ खुराफाती हंगामा खड़ा कर देते थे। सबसे बड़ा उदाहरण टोरंट है। पिछले पांच साल में इस क्षेत्र में बिजली की केबल अंडरग्राउंड करने में कंपनी के पसीने छूट गए। जबकि शहर के अधिकांश क्षेत्रों में केबल अंडरग्राउंड की जा चुकी है। जब भी टीम पहुंची, खुराफातियों ने उसे खदेड़ दिया। मगर, प्रदेश में सत्ता परिवर्तन के साथ ही मंटोला में भी परिवर्तन साफ नजर आ रहा है। पहली बार बिना विरोध के कोई अभियान इस क्षेत्र में चला।
अवैध बूचड़खानों में मोटा मुनाफा
महज 30 मिनट का समय और 10 से 15 हजार रुपये की कमाई। सुबह-सुबह केवल 3 घंटे में अवैध बूचड़खानों के संचालक लाख रुपये तक की कमाई कर रहे हैं। अकेले मंटोला इलाके में 80 से 100 भैंस हर दिन सुबह-सुबह काटी जा रही हैं। गोश्त से लेकर खाल तक की बिक्री में हर भैंस से 45 से 50 हजार रुपये मिल रहे हैं।
मंटोला क्षेत्र में अवैध बूचड़खानों में हर सुबह भैंसों को काटा जा रहा है। एक बूचड़खाना संचालक ने बताया कि पैठ से वह 25 से 30 हजार रुपये की भैंस खरीदकर लाते हैं, जिसका मीट, खाल, सींग, खून आदि बेचने के बाद करीब 45-50 हजार रुपये की कमाई हो जाती है।
औसतन 200 किलो मीट, 400 रुपये प्रति जोड़ी की दर से पैर, 600 रुपये का सिर, 300 रुपये किलो से कलेजी और 1200-1500 रुपये की खाल बिकती है। महज आधे घंटे में ही भैंस का अस्तित्व खत्म कर दिया जाता है। हर भैंस पर 15 हजार रुपये तक की कमाई के चलते अवैध बूचड़खाने बढ़ रहे हैं। ऐसा कोई बूचड़खाना नहीं जो हर दिन 6 से 8 भैंस की कटाई न करता हो। नगर निगम और पुलिस छापा डालने के लिए न आए, इसका भी इंतजाम किया जाता है।