मैनपुरी/आलीपुर खेड़ा। गुलामी की जंजीरों को तोड़कर देश को आजादी दिलाने के लिए हजारों वीरों ने अपने प्राणों की आहुति दी। देश की आजादी की खातिर जमींदारी का मोह छोड़कर देश की स्वतंत्रता के लिए जीवन दांव पर लगा दिया। मैनपुरी षड्यंत्र केस में शामिल होकर क्रांतिकारी संगठन मातृवेदी में भी अहम भूमिका निभाई।
भोगांव क्षेत्र के गांव आलीपुर पट्टी निवासी दम्मीलाल पांडेय का जन्म जमींदार भिखारीलाल पांडेय के घर वर्ष 1894 में हुआ था। आगरा कॉलेज में उच्च शिक्षा प्राप्त करने के दौरान ही वह क्रांतिकारियों के संपर्क में आ गए। मातृवेदी संस्था के लिए क्रांतिकारी गेंदालाल दीक्षित और देवनारायण भारती के साथ ग्वालियर से हथियार लाते समय वह वर्ष 1917 में राजा मंडी रेलवे स्टेशन आगरा में पकड़े गए। क्रांतिकारियों के लिए धन जुटाने के लिए साथियों के साथ उन्होंने सरकारी धन तक लूटा।
वर्ष 1919 में मैनपुरी षड्यंत्र केस में शामिल दम्मीलाल को जेल जाना पड़ा। उन्होंने महात्मा गांधी के आह्वान पर वर्ष 1931-32 में नमक सत्याग्रह और वर्ष 1940-41 में व्यक्तिगत सत्याग्रह में सक्रिय योगदान दिया। वहीं, जब महात्मा गांधी ने वर्ष 1942 में अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन का आह्वान किया तो वह आंदोलन में जुट गए। जिले भर में गुप्त बैठकें कर लोगों में आजादी का जज्बा पैदा करने का काम किया।
स्वतंत्रता सेनानी दम्मीलाल पांडेय ने आजाद भारत में सांस लेने के बाद वर्ष 1955 में अंतिम सांस ली। उनके निधन के बाद से आज तक किसी ने गांव में उनकी स्मृति बनाए रखने के लिए स्मारक तक नहीं बनाया। यही कारण है कि आज की पीढ़ी इस महान क्रांतिकारी के बारे में सब कुछ भूलती जा रही है। चर्चा है कि आजादी के आंदोलन के दौरान दम्मीलाल पांडेय पर कई मुकदमे चले। मुकदमों के दौरान न्यायाधीश द्वारा जब भी उनका पेशा पूछा जाता, वह हमेशा निर्भीकता से जवाब देते मेरा पेशा अंग्रेजी सरकार के खिलाफ नफरत पैदा करना और असहयोग की भावना उत्पन्न करना है। इसकी सजा भी हर बार उनको मिली, लेकिन वह जुल्म और ज्यादती के आगे नहीं झुके।