मैनपुरी। अस्पताल में गंभीर हालत में भर्ती कराए जाने वालों का मृत्यु पूर्व बयान कराना जरूरी होगा। गंभीर मामलों में अब अस्पताल प्रशासन को मजिस्ट्रेट को सूचना देनी होगी। अस्पताल से केवल पुलिस को ही मीमो भेजे जाने से गंभीर हालत वाले मरीजों के मृत्यु पूर्व बयान (डीडी) दर्ज नहीं हो पाने से कई घटनाओं का खुलासा नहीं हो पाता है।
गंभीर हालत में अस्पताल में भर्ती कराए जाने वालों के मृत्यु पूर्व बयान कराने को हाईकोर्ट केे अनिवार्य किया है। दहेज की खातिर महिलाओं की हत्या, हत्या, जानलेवा हमला, लूट और डकैती में गंभीर रूप से घायल होने, महिला संबंधी अपराधों के मामलों में पीड़िताओं को अस्पताल में भर्ती कराने के बाद अस्पताल से पुलिस को मीमो केे माध्यम से सूचना दी जाती है। हालत गंभीर होने पर घायलों को बेहतर उपचार के लिए रेफर कर दिया जाता है। दूसरे जिले में भर्ती घायल की मौत होने पर उसका मृत्यु पूर्व बयान दर्ज नहीं हो पाता है। मृत्यु पूर्व बयान दर्ज नहीं हो पाने से पुलिस मामले की तह तक नहीं पहुंच पाती है। साथ ही अपराध की सच्चाई का खुलासा भी नहीं हो पाने से वास्तविक दोषियों को सजा नहीं हो पाती है। अब नई प्रक्रिया के लागू होने से पीड़ित पक्ष को न्याय मिल सकेगा।
केस नंबर-एक
थाना बरनाहल के गांव औरंगाबाद में अप्रैल 2014 में सीमा की दहेज की खातिर जलाकर हत्या की गई। उसका मृत्यु पूर्व बयान दर्ज किया गया। मृत्यु पूर्व बयान के आधार पर ही पति, सास, ससुर को अदालत से सजा हो सकी।
केस नंबर-दो
थाना कोतवाली क्षेत्र के आगरा रोड निवासी सुशीला देवी की जून 2011 में जहर देकर हत्या कर दी गई। उसका मृत्यु पूर्व बयान दर्ज हुआ। अदालत में सुनवाई के दौरान बयान से ही पति और सास को अदालत से सजा हुई।
नई प्रक्रिया से पीड़ित पक्ष को लाभ होगा। अभी तक इमरजेंसी से पुलिस को ही सूचना दी जाती थी। अब मजिस्ट्रेट को सूचना दिए जाने से हर हाल में और शीघ्र मृत्यु पूर्व बयान दर्ज हो जाएगा।
अजय कृष्ण पांडेय, अध्यक्ष बार एसोसिएशन
अदालत में सुनवाई के दौरान मृत्यु पूर्व बयान (डीडी) महत्वपूर्ण और विश्वसनीय साक्ष्य माना जाता है। जिन मामलों में डीडी दर्ज किया गया है उनमें साक्ष्य के बाद अधिकांशत: सजा सुनाई जाती है।
अनिल कुमार शर्मा, अधिवक्ता फौजदारी