नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के कोर्ट कमिश्नर मुकेश कुमार गुप्ता ने 23 और 24 सितंबर को 13 प्रोजेक्ट का निरीक्षण कर रिपोर्ट सौंपी थी। फ्लड प्लेन, पिलर और नदी को मलबे से पाटने का खेल खुद कोर्ट कमिश्नर ने देखा। पिछली सुनवाई में उन्होंने जो रिपोर्ट सौंपी, उसी ने अफसरों और बिल्डरों के खेल का खुलासा कर दिया। कोर्ट कमिश्नर की रिपोर्ट में हर प्रोजेक्ट के पास लगे पिलर और नदी को पाटने का ब्योरा पेश किया गया है। साल 2010 में आई बाढ़ को आधार मानते हुए लगाए गए 103 पिलरों और निशानों में कई गड़बड़ियां हैं, मलबे और गलत तरीके से लगाए गए पिलरों पर भी रिपोर्ट में टिप्पणी की गई है।
अभी एनजीटी का आदेश प्राप्त नहीं हुआ है। आदेश मिलने के बाद अध्ययन कराया जाएगा। आदेश के मुताबिक ही प्राधिकरण कार्यवाही कराएगा।
राजकुमार, सचिव, आगरा विकास प्राधिकरण
लोकल कमिश्नर की रिपोर्ट में ये खास
ताज व्यू अपार्टमेंट, यमुना किनारा रोड
पिलर नंबर आरडी 36-37 के बीच में मौजूद अपार्टमेंट के रिफरेंस प्वाइंट की यमुना से दूरी 5.6 मीटर पाई गई। यहां पिलर मलबे पर थे और ऑरिजिनल फ्लड प्लेन पर नहीं थे। सीवेज लाइन नगर निगम की लाइन से जुड़ी नहीं है। दो पिलरों के बीच प्रोजेक्ट बाउंड्री से 90 डिग्री का अंतर पाया गया।
होटल ताज वे इन, घटवासन
पिलर नंबर 35-36 के बीच मौजूद होटल के रिफरेंस प्वाइंट की यमुना किनारे से दूरी चार मीटर पाई गई। पिलर यहां भी मलबे से पाटे गए फ्लड प्लेन पर लगाए गए। एसटीपी भी लगाया नहीं है और नदी के अंदर चार मीटर तक नजदीकी निर्माण किया गया है।
इंदिरा एस्टेट मिल कंपाउंड, जोंस मिल
पिलर नंबर 33 के पास मौजूद परिसर पुराना है और एसटीपी नहीं है। सीवेज लाइन न तो है और न ही नगर निगम लाइन से जुड़ी हैं।
आस्था सिटी सेंटर, जोंस मिल
पिलर नंबर 32 के पास मौजूद सेंटर की रिफरेंस प्वाइंट से दूरी 5.85 मीटर है। नदी किनारे के समानांतर बने प्रोजेक्ट में पिलर मलबे पर मौजूद है। एसटीपी संचालित होती नहीं मिली। सीवेज लाइन भी न तो हैं और न ही जुड़ी हैं। यमुना में नजदीकी निर्माण तीन मीटर अंदर तक है।
गणपति वंडर सिटी, खासपुर
प्रोजेक्ट का निर्माण पिलर से छूता हुआ पाया गया। कंस्ट्रक्शन जारी है और कोई भी रिहाइश नहीं है। अंदरूनी सीवेज लाइनें हैं, लेकिन निगम की लाइनों से जुड़ी नहीं हैं। डूब क्षेत्र निर्धारण का पिलर बाउंड्री से सटा है।
विभव वाटिका, जगनपुर
पिलर से प्रोजेक्ट की दूरी नापने पर 45 डिग्री का कोण लिया गया, लेकिन जगनपुर एसटीपी समेत कई इमारतें होने से यह मापा नहीं जा सका। दो पिलरों के बीच नदी का तेज मुड़ाव है। पिलर से 345 मीटर की दूरी है।
राधा वल्लभ पब्लिक स्कूल, जगनपुर
सड़क के बीचोबीच पिलर आरयू 32 मलबे पर बना है और निर्माण सामग्री से ढका हुआ था। पिलर से प्रोजेक्ट की दूरी -102 मीटर मिली। 2010 की बाढ़ के बाद पूरे निचले क्षेत्र को मलबे, कंक्रीट और मिट्टी से ढका गया है। बाढ़ के दौरान निचला हिस्सा होने से पानी नदी के किनारे से आसानी से 267 मीटर दूरी तक पहुंचा था।
राजश्री गार्डन, जगनपुर
पिलर से प्रोजेक्ट सटा है। बाउंड्री से एक मीटर दूरी पर मंदिर बना हुआ है। एसटीपी निर्माणाधीन/संचालित नहीं है। सेप्टिक टैंक से सीवेज सीधे यमुना नदी में गिरता हुआ मिला। सीवेज लाइनें निगम की लाइनों से जुड़ी नहीं हैं।
जवाहर बाग-2, मऊ
पिलर से सटाकर बने प्रोजेक्ट को आगरा विकास प्राधिकरण के रिकार्ड में जवाहर बाग नाम दिया, लेकिन यह वैभव गार्डन-2 के नाम से मिल पाई। एसटीपी नहीं है और न ही सीवेज लाइनें। यमुना में सीवर गिर रहा है।
कल्याणी हाइट्स, मऊ
पिलर से प्रोजेक्ट की उत्तरी दीवार 5.5 मीटर दूर है। अगर पिलर नंबर 36 और 37 के बीच सीधी रेखा खींची जाए तो प्रोजेक्ट यमुना नदी के फ्लड प्लेन में आएगा। प्रोजेक्ट में एसटीपी नहीं मिली। सीवेज लाइनें भी नगर निगम की लाइन से जुड़ी नहीं मिलीं।
राम मोहन विहार, मऊ
पिलर से 332 मीटर दूरी पर बने प्रोजेक्ट में एसटीपी नहीं मिली और न ही सीवेज लाइनें पाई गईं। पूरी कालोनी का सीवेज सेप्टिक टैंक में गिरता है और ओवरफ्लो होने पर यह कल्याणी हाट के पास से गुजर रहे नाले में पहुंचकर यमुना में मिलता है।
मंगलम शिला, मौजामऊ
पिलर से 197 मीटर दूरी पर बने प्रोजेक्ट में एसटीपी नहीं है और सीवेज लाइनें निगम की लाइनों से जुड़ी नहीं हैं।
अपर्णा रिवरव्यू अपार्टमेंट, मऊ
पिलर से 170.6 मीटर दूर प्रोजेक्ट में सीवेज लाइनें निगम की लाइनों से जुड़ी हैं, लेकिन एसटीपी मौजूद नहीं है।
पुष्पांजलि सीजंस, जगनपुर
प्रोजेक्ट के पिछले निरीक्षण में अचानक तेज बारिश से आंकड़ों में गलतियां पाई गईं, लेकिन दुबारा निरीक्षण में यमुना नदी के सबसे नजदीकी किनारे से प्रोजेक्ट की दूरी मापी गई।
पटवा और जाफरी बने पक्षकार
आगरा। याचिकाकर्ता डीके जोशी के निधन के बाद हुई सुनवाई में उनके पक्ष से उमाशंकर पटवा और एचएस जाफरी को पक्षकार नियुक्त किया गया। एक नवंबर को हुई सुनवाई में दोनों ने पक्षकार बनने के लिए प्रार्थना पत्र दिया था, जिसे सोमवार को मान लिया गया।
सरकारी विभागों की मिलीभगत से नदी किनारे हुए निर्माण
आगरा। सरकारी विभाग अभी भी बिल्डरों को बचाने की कोशिश में लगे हैं। पहले तो डूब क्षेत्र में कालोनियों और बहुमंजिला इमारतों के मानचित्र स्वीकृत कर दिए। बाद में जब इस कारगुजारी की पोल खुली तो डूब क्षेत्र के निर्धारण में ही खेल कर दिया। लेकिन दाल गल नहीं पाई।
एनजीटी ने डूब क्षेत्र के चिह्निकरण और अनुचित पिलर लगाए जाने पर ऐसे ही सवाल नहीं उठाए। दरअसल, पिछले साल डीके जोशी की जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए एनजीटी ने सिंचाई विभाग को यमुना के डूब क्षेत्र का निर्धारण करने को कहा था। ताकि तय हो सके कि याचिकाकर्ता ने जिन निर्माणों को डूब क्षेत्र में बताया है, वह डूब क्षेत्र में हैं या नहीं। ऐसा करने पर तमाम बिल्डरों के प्रोजेक्टों पर संकट गहरा जाता। इनको बचाने और एनजीटी के निर्देशों का पालन करने के लिए सिंचाई विभाग ने आगरा विकास प्राधिकरण से मिलकर डूब क्षेत्र निर्धारण के नाम पर खानापूर्ति कर दी। बिना किसी मानक के अपने अनुसार यमुना में डूब क्षेत्र के पिलर खड़े कर दिए। वह भी बहुमंजिला इमारतों और कालोनियों को बचाते हुए। अगली सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने इस पर सवाल खड़े किए। सच्चाई जानने के लिए एनजीटी ने लोकल कमिश्नर नियुक्त कर दिए। पिछले दिनों जब वे जांच को आए तो सिंचाई विभाग की कलई खुल गई। सिंचाई विभाग ने लोकल कमिश्नर को भी गुमराह करने की कोशिश की। उन्हें बताया कि बहुत से पिलर उखड़ गए हैं। मगर, अब उनके सारे पैैंतरे अब फेल होते नजर आ रहे हैं।
लोकल कमिश्नर ने दो बार की जांच
सिंचाई विभाग के अधिकारियों ने लोकल कमिश्नर को पहली बार गुमराह कर दिया। दो बिल्डरों को बचाने के लिए यमुना से उनके निर्माणों की दूरी ही गलत नपवा दी। बाद में एनजीटी में याचिकाकर्ता ने लोकल कमिश्नर की इस जांच को भी चुनौती दी। इस पर दोबारा नाप हुई। इस बार अधिकांश निर्माण डूब क्षेत्र में पाए गए। इसी आधार पर एनजीटी ने 85 फीसदी निर्माणों को ध्वस्त किए जाने लायक कहा है।
स्वीकृति में भी ‘खेल’
यमुना ऐसे ही बदहाल नहीं हुई। इसकी तलहटी में कंकरीट का जाल बिछाने में किसी भी विभाग ने कभी कसर नहीं छोड़ी। सबसे पहले सिंचाई विभाग ने यमुना किनारे निर्माण की अनुमति दी। विभाग की तरफ से बिल्डरों को अनापत्ति प्रमाण पत्र थमा दिए गए। एनजीटी में जब यह मामला उछला तो सिंचाई विभाग पलट गया। कहा कि उसकी तरफ से किसी को एनओसी जारी नहीं की गई है। उसने तो सिर्फ प्रस्तावित निर्माण के स्थान की यमुना से ऊंचाई से संबंधित जानकारी दी है। नदी किनारे निर्माण के लिए सिंचाई विभाग ने आगरा विकास प्राधिकरण के सिर पर ठीकरा फोड़ा। इधर, प्राधिकरण का तर्क था कि उसने सिंचाई विभाग की एनओसी पर बिल्डरों के मानचित्र स्वीकृत किए। मगर, हकीकत में बिल्डरों की दोनों ही विभागों से मिलीभगत थी। सूत्रों की मानें तो बिल्डरों को यमुना किनारे निर्माण का सुझाव भी इन्हीं दोनों विभागों के जूनियर इंजीनियरों ने दिया। इतना ही नहीं, जलकल और बिजली विभाग ने भी बिल्डरों से ‘समझौता’ करते हुए एनओसी जारी कर दीं।
यमुना में गिर रहे नाले
कई बहुमंजिला इमारतों और कालोनियों का गंदा पानी सीधे यमुना में गिर रहा है। पूर्व में एनजीटी ने जल निगम को यमुना में गिरने वाले सभी नालाें को टैप करने के निर्देश दिए थे। इस पर जल निगम ने 52 ऐसे नाले चिह्नित किए थे, जो सीधे नदी में गिर रहे थे। इनमें से जल निगम ने लगभग आधे नाले तो टैप कर दिए लेकिन अभी भी आधे नाले यमुना को दूषित कर रहे हैं।