सामुदायिक रेडियो के कार्यक्रम में वक्ता
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अमर उजाला और डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय के सामुदायिक रेडियो '90.4 - आगरा की आवाज' के साप्ताहिक कार्यक्रम ‘सामाजिक सरोकार’ में रविवार को किसान आंदोलन पर वक्ताओं ने परिचर्चा की। वक्ताओं ने 100 साल पहले हुए आंदोलन से जोड़ते हुए अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि किसानों के आंदोलन ने साबित कर दिया है कि उनका जाति-मजहब एक है।
मुख्य वक्ता कमिश्नर प्रोविडेंट फंड राजीव कुमार पाल ने अपने उपन्यास ‘एका’ का जिक्र करते हुए कहा कि 100 साल पहले अवध क्षेत्र में भी ऐसा आंदोलन हुआ था। असंतोष की आवाज थी, जो मुखर हुई। इसका नेतृत्व महाराष्ट्र के बाबा रामचंद्र ने किया। वह फिजी से लौटे थे। यह आंदोलन 12 जिलों में फैल गया था। बाबा रामचंद्र के जेल जाने के बाद मदारी पासी ने जिम्मा संभाला। इस आंदोलन में भूमिहीन किसान, छोटे-बड़े सभी किसान शामिल हुए। जाति-मजहब भी कोई मायने नहीं था, मतलब किसान की कोई जाति नहीं है। इस आंदोलन में भी कोई बड़ा नाम नहीं है।
वरिष्ठ साहित्यकार सुशील सरित ने कहा कि किसानों के शोषण की गाथा कोई नई नहीं है, अंग्रेजों की गुलामी से अब तक किसान उपेक्षित है। स्पष्ट है कि बिना जमीनी स्तर से जुड़े हुए किसान हित में कोई कानून नहीं बन सकता। इस कानून में यह हुआ है कि नहीं कहा नहीं जा सकता, लेकिन कुछ तो गड़बड़ है जो यह आंदोलन खड़ा हुआ।
दयालबाग शिक्षण संस्थान के हिंदी विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर प्रेमशंकर ने कहा कि एका आंदोलन में भी निम्न वर्ग के लोग रहे, जिनमें समस्याओं के समाधान न हो पाने से उनमें कहीं न कहीं अकुलाहट जरूर रही होगी। वर्तमान आंदोलन में भी यह देखने मिल रहा है। किसानों का आरोप है कि नए कृषि के तीन विधेयक हैं, इसमें सरकार अपने रोल से हटकर किसानों को व्यापारियों के हाथों में छोड़ने जा रही है। एक तरह से निजीकरण है, जिसका पुरजोर विरोध किया जा रहा है।