1960 में आत्मसमर्पण और जेल जाने से पहले राखी बंधवाने पर खूूंखार डकैतों की आंखें छलकने की घटना चंबल घाटी के गांवों में रक्षाबंधन पर आज भी चौपालों पर चर्चा का विषय बनती है। जेल की सलाखों के भीतर तक धर्म की बहनों की डोर बंधी रही थी।
12 मई 1960 को संत विनोबा ने पिनाहट से बागियों के हृदय परिवर्तन की पदयात्रा शुरू की थी। 12 मई को संत विनोबा मेजर जनरल यदुनाथ सिंह के साथ निकले। 13 मई को मुरैना के रछेड़, 14 को अम्बाह, 16 को पोरसा, 17 को नगरा, 18 को कनेरा, 19 को कदौरा में पदयात्रा का पड़ाव रहा था।
यहां पर मानसिंह रूपा गिरोह के 19 बागियों ने संत विनोबा के समक्ष हथियार डाल दिए थे। 22 मई को रक्षाबंधन का पर्व था। जेल जाने से पहले संत विनोबा और यदुनाथ सिंह की मौजूदगी में प्रार्थना सभा का आयोजन हुआ। डकैत लोकमन दीक्षित, तेज सिंह, भगवान सिंह, भूप सिंह, कन्हई, बदन सिंह, पातीराम, विद्याराम, डरेलाल, मटरे, जंगजीत, राम सनेही, दुर्जन, श्रीकृष्ण, लच्क्षी, मोहरमन , करन सिंह, रामदयाल, प्रभु को एक-एक कर कांता बहन ने टीका किया।
हरिविलासी बहन ने राखी बांधी। चंबल की घटनाओं पर नजर रखने वाले डॉ. बीपी मिश्र बताते है कि यह पल बहुत भावुक कर देने वाला था। राखी बंधवाने वाले डकैतों की आंखों में आंसू छलक पड़े थे। धर्म की बहन-भाइयों की राखी की डोर का रिश्ता जेल की सलाखों के भीतर तक चला। कांत और हरिविलासी बहन जेल तक उनके साथ गईं।
उन्होंने बताया कि रक्षाबंधन पर भिण्ड, मुरैना, बाह, इटावा, राजाखेड़ा, धौलपुर तक के गांवों की चौपालों पर रक्षाबंधन का यह घटनाक्रम लोगों की जुबां पर होता है। नैतिक पतन की घटनाओं के बीच डकैतों की राखी को गांव की चौपालों पर सबक के रूप में पेश किया जाता है।