यमुना किनारे अवैध निर्माण के मामले पर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) के कड़े आदेश के बाद आगरा विकास प्राधिकरण समेत अन्य प्राधिकरणों ने डूब क्षेत्र का फिर से सीमांकन करने का निर्णय लिया है।
सुनवाई के दौरान प्राधिकरण की ओर से पेश प्रतिनिधियों ने ट्रिब्यूनल को बताया कि बैठक में डूब क्षेत्र के सीमांकन को लेकर सहमति हो गई है। इसके लिए प्रधान पीठ एक निगरानी समिति (सुपरवाइजरी कमेटी) भी गठित कर सकती है। वहीं पीठ ने बयान दर्ज करने के बाद मामले पर 30 नवंबर के लिए सुनवाई तय की है। जस्टिस स्वतंत्र कुमार की अध्यक्षता वाली पीठ ने बुधवार को उमाशंकर पटवा मामले पर सुनवाई की। मालूम हो कि पूर्व याची डीके जोशी के निधन के बाद मामले में नया पैरोकार बनाया गया था।
अगली सुनवाई में एनजीटी डूब क्षेत्र सीमांकन को लेकर विस्तृत आदेश दे सकता है। इस मामले में एनजीटी के जरिए नियुक्त लोकल कमिश्नर ने दो बार यमुना किनारे मौजूद रिहायशी परियोजनाओं के जरिए डूब क्षेत्र में किए गए अतिक्रमण और सीमांकन के लिए लगाए गए खंभों की नापजोख पर आधारित रिपोर्ट दी थी। दोनों रिपोर्ट में इस बात पर जोर दिया गया था कि डूब क्षेत्र का सीमांकन मानकों पर नहीं है। इस वजह से परियोजनाओं का विस्तार यमुना किनारे डूब क्षेत्र तक हुआ है। वहीं पीठ ने मामले में रिपोर्ट पर गौर करने के बाद अपनी टिप्पणी में कहा था कि यमुना किनारे करीब 85 फीसदी निर्माण कार्य अवैध है।