आगरा में अपराधियों को कारतूस बेचे जा रहे हैं। पुलिस इसका शक जाहिर कर रही है, लेकिन विधि विज्ञान प्रयोगशाला (एफएसएल) की रिपोर्ट इसकी पुष्टि कर रही है। दरअसल, एफएसएल में हर साल 5000 कारतूस परीक्षण के लिए आ रहे हैं। इनके साथ लाइसेंसी नहीं, अवैध असलहा होते हैं। जाहिर है अपराधियों को कारतूस शस्त्रधारक का शस्त्र विक्रेता से ही मिल रहे हैं।
एफएसएल में पिछले साल 4992 कारतूस आए। इनमें से 4500 के साथ परीक्षण के लिए अवैध असलहा (तमंचे आदि) आए थे। इन असलहा का इस्तेमाल अपराध में हुआ। आगरा से 450 कारतूस पहुंचे। सवाल यह है कि अपराधियों के पास इतने कारतूस कैसे पहुंचे? एफएसएल के संयुक्त निदेशक डॉ. एके मित्तल से इस बारे में बात की गई।
क्या लैब में आए कारतूस किसी अवैध कारखाने के बने हुए हैं? उनका जवाब था, नहीं, ऐसा नहीं हैं। क्या ऐसा नहीं है कि खोखो में बारूद भर से फिर से कारतूस बनाए गए हों? उनका कहना था कि नहीं, ऐसा भी नहीं है। परीक्षण में पता चल जाता है। वैसे यह मुमकि न भी नहीं है।
लैब में किस बोर के कारतूस ज्यादा आए हैं? इस सवाल पर उनका कहना था कि ये 315 और 12 बोर के हैं? क्या प्रतिबंधित बोर के कारतूस भी आ रहे हैं? इस पर जवाब था, हां, आ रहे हैं, लेकिन इनकी संख्या कम है। प्रतिबंधित बोर पुलिस, अर्द्धसैनिक बलों और आर्मी को दिया जाता है।
पुलिस को गायब मिले 70 हजार कारतूस
आगरा पुलिस ने दो महीने की मशक्कत के बाद यह रिपोर्ट दी कि जिले के 910 शस्त्र लाइसेंसधारकों के रिकार्ड से 70 हजार कारतूस गायब हैं। सवाल उठा कि ये कारतूस कहां गए? प्रशासन ने मान लिया कि इनका इस्तेमाल हर्ष फायरिंग में हुआ जबकि पुलिस को शक है कि इन्हें अपराधियों को बेचा गया होगा।
'शस्त्र विक्रेता करते हैं गड़बड़ी'
अपराधियों के पास कारतूस कहां से आते हैं? क्या शस्त्र विक्रेता और शस्त्र लाइसेंसधारी लोग उन्हें कारतूस बेचते हैं? यही सवाल पुलिस में 34 साल सेवा देने वाले रिटायर्ड डीएसपी एके सिंह से किया गया तो उनका जवाब था, हां ऐसा होता है, शस्त्र विक्रेता गड़बड़ी करते हैं। सभी नहीं लेकिन ज्यादातर।
उन्होंने कहा कि पुलिस जब अपराधियों को पकड़ती है और कारतूस बरामद करती है तो तभी ठीक से पूछताछ होनी चाहिए कि कारतूस कहां से आए? हालांकि कई मामलों में पुलिस तह तक गई है। सईद नगर चौकी के पास कावेरीकुंज निवासी एके सिंह कहते हैं कि कई मामले ऐसे भी आए हैं जब पुलिसवालों ने कारतूस बेचे।
यह व्यापक स्तर पर जांच किए जाने का विषय है। तभी पता चलेगा कि अपराधियों के पास कारतूस कहां कहां से आ रहे हैं? यह नियम पहले से है कि शस्त्र विक्रेता किसी को नए कारतूस देने से पहले पुरानों का पूरा हिसाब ले, उसे रजिस्टर में दर्ज करे और खोखे देखे।
बाद में यह नियम आया कि खोखे जमा कराए जाए लेकिन न पहले नियम का पालन होता था, न अब हो रहा है। जिला राइफल क्लब का कामकाज देखा जाना चाहिए। जो लोग असलाह खरीदते हैं, उनकी जिम्मेदारी है कि एक बार आरआई को दिखाएं, लेकिन वे ऐसा नहीं करते। दिक्कत कई जगह है।